10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 59A || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्ण के सहस्रनामों का वर्णन (1 से 250 तक)
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 59A || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्ण के सहस्रनामों का वर्णन (1 से 250 तक)
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! तब राजा उग्रसेन ने पुत्र की आशा छोड़कर सम्पूर्ण विश्व को मन का संकल्प मात्र जानकर व्यासजी से अपना संदेह पूछा- ‘ब्रह्मन ! किस प्रकार से लौकिक सुख का परित्याग करके मनुष्य परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण का भजन करे, यह मुझे विश्वासपूर्वक बताने की कृपा करें।
व्यासजी बोले- महाराज उग्रसेन ! मैं तुम्हारे सामने सत्य और हितकर बात कह रहा हूँ, इसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। राजेन्द्र ! तुम श्रीराधा और श्रीकृष्ण की उत्कृष्ट आराधना करो। इन दोनों के पृथक-पृथक सहस्त्र भाव से भजन करो। भूपते ! राधा के सहस्र नाम को ब्रह्मा, शंकर, नारद और कोई-कोई मेरे- जैसे- लोग भी जानते हैं।
उग्रसेन ने कहा- ब्रह्मन ! मैंने पूर्वकाल में सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र के एकान्त दिव्य शिविर में नारदजी के मुख से ‘राधिकासहस्रनाम’ का श्रवण किया था, परंतु अनायास ही महान कर्म करने वाले भगवान श्रीकृष्ण के सहस्त्र नाम को मैंने नहीं सुना है। अत: कृपा करके मेरे सामने उसी का वर्णन कीजिये, जिससे मैं कल्याण का भागी हो सकूं।
श्रीगर्गजी कहते हैं- उग्रसेन यह बात सुनकर महामुनि वेदव्यास ने प्रसन्नचित्त होकर उनकी प्रशंसा की और श्रीकृष्ण की ओर देखते हुए कहा।
व्यासजी बोले- सुनो। मैं तुम्हें श्रीकृष्ण का सुन्दर सहस्रनाम स्त्रोत सुनाऊंगा, जिसे पहले अपने परमधाम गोलोक में इन भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीराधा के लिए प्रकट किया था।
श्रीभगवान बोले- प्रिये ! यह सहस्रनाम स्तोत्र, जो अभी बताया जायेगा, गोपनीय रहस्य है। इसे हर एक के सामने प्रकट कर दिया जाये तो सदा हानि ही उठानी पडे़गी। अधिकारी के सामने प्रकट किया गया यह स्त्रोत सम्पूर्ण सुखों को देने वाला, मोक्षदायक, कल्याणस्वरूप, उत्कृष्ट परमार्थ रूप और समस्त पुरुषार्थों को देने वाला है। श्रीकृष्णसहस्त्रनाम मेरा रूप है। जो इसका पाठ करेगा, वह मेरा स्वरूप होकर ही प्रसिद्ध होगा। कहीं किसी शठ और दाम्भिक को इसका उपदेश कदापि नहीं देना चाहिये। जो करुणा से भरा हुआ तथा गुरु के चरणों में निरन्तर भक्ति रखने वाला है, उस संतों के सेवक और मद एवं क्रोध से रहित मुझ श्रीकृष्ण के भक्त को ही इसका उपदेश देना चाहिये।
विनियोग
ॐ अस्य श्रीकृष्णसहस्त्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य
नारायण ॠषिर्भुजंगप्रयातं छन्द: श्रीकृष्णचन्द्रो
देवता वासुदेवो बीजम् श्रीराधाशक्ति: मन्मथ:
कीलकम् श्रीपूर्णब्रह्मकृष्णचन्द्रभक्तिजन्यफलप्राप्तये जपे विनियोग:।
इस ‘श्रीकृष्णसहस्रनामस्तोत्रमन्त्र’ के नारायण ॠषि हैं, भुजंगप्रयात छन्द है, श्रीकृष्णचन्द्र देवता हैं, वासुदेव बीज, श्रीराधा शक्ति और मन्मथ कीलक है। श्रीपूर्णब्रह्म कृष्णचन्द्र की भक्तिजन्य फल की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है।
ध्यान
शिखिमुकुटविशेषं नीलपद्मांगदेशं
विधुमुखकृतकेशं कौस्तुभापीतवेशम्।
मधुररवकलेशं शं भजे भ्रातृशेषं
व्रजजनवनितेशं माधवं राधिकेशम्।।
जिनके मस्तक पर मोरपुख का मुकुट विशेष शोभा देता है, जिनका अंगदेश (सम्पूर्ण शरीर) नील कमल के समान श्याम है, चन्द्रमा के समान मनोहर मुख पर कुंचित केश सुशोभित हैं, कौस्तुभमणि की सुनहरी आभा से जिनका वेश कुछ पीतवर्ण का दिखायी देता है (अथवा जो पीताम्बरधारी हैं) जो मीठी धुन में मुरली बजा रहे हैं, कल्याण स्वरूप हैं, शेषावतार बलराम जिनके भाई हैं तथा जो व्रजवनिताओं के वल्लभ हैं, उन राधिका के प्राणेश्वर माधव का मैं भजन (चिन्तन) करता हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण के सहस्रनामों का वर्णन
(१ से २५० तक)
१. हरि: →भक्तकि पाप-तापका हरण करनेवाले,
२. देवकीनन्दनः→ अपने आविर्भावसे माता देवकी एवं यशोदाको आनन्द प्रदान करनेवाले,
३. कंस हन्ता →कंसका वध करनेवाले,
४. परात्मा →परमात्मा,
५. पीताम्बरः →पीतवस्त्रधारी,
६. पूर्णदेवः →परिपूर्ण शान्त, देवता श्रीकृष्ण,
७. रमेश: →रमावल्लभ,
८. कृष्ण:→ सबको अपनी ओर आकर्षित करनेवाले,
९. परेश:→ सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मा आदि देवताओंके भी निवन्ता,
१०. पुराण: →पुरातन पुरुष या अनादिसिद्ध,
११. सुरेशः →देवताओंपर भी शासन करनेवाले, १२. अच्युतः→ अपनी महिमा या मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले,
१३. वासुदेवः → वसुदेवनन्दन अथवा सबके अन्तः-करणमें निवास करनेवाले देवता, चार व्यूहॉमें से प्रथम व्यूहस्वरूप, देवः प्रकाशस्वरूप परम देवता
१४. देव: → प्रकाश स्वरूप परम देवता
१५. धराभारहर्ता → पृथ्वीका भार हरण करनेवाले, कृती कृतकृत्य पुण्यात्मा
१७. राधिकेशः → राधाप्राणवल्लभ,
१८. पर: → सर्वोत्कृष्ट,
१९. भूवरः → पृथ्वीके स्वामी
२०. दिव्यगोलोकनाथः→ दिव्यधाम गोलोकके स्वामी,
२१. सुदानस्तथा राधिकाशापहेतुः→ सुदामा तथा राधिकाके पारस्परिक शापमें कारण,
२२. घृणी → दयालु,
२३. मानिनीमानदः → मानिनीको मान देने वाले, २४. दिव्यलोकः → दिव्यधामस्वरूप ॥ १५ ॥
२५. लसद्गोपवेशः-सुन्दर गोपवेषधारी,
२६. अजः- अजन्मा,
२७. राधिकात्मा-राधिकाके आत्मा अथवा राधिका है आत्मा जिनकी
२८. चलत्कुण्डल:- हिलते हुए कुण्डलों से सुशोभित,
२९. कुन्तली-घुँघराली अलकोंसे शोभायमान,
३०. कुन्तलस्त्रक्-केशराशिमें फूलांक हार धारण
करनेवाले,
३१. कदाचिद् राधया रथस्थ: →कभी-कभी राधिकाके साथ रथमें विराजमान
३२. दिव्यरत्न: →दिव्य मणि कौस्तुभ धारण करने वाली अथवा अखिल जगत्के दिव्यरत्नस्वरूप,
३३. सुधासौधभूचारण:-चूनासे लिपे-पुते छतकी महलपर घूमनेवाले,
३४. दिव्यवासाः-दिव्य वस्त्रधारी ॥ १६ ॥
३५. कदा वृन्दकारण्यचारी-कभी-कभी वृन्दावनमें विचरनेवाले,
३६. स्वलोके महारब सिंहासनस्थः=अपने धाममें महामूल्यवान् एवं विशाल रत्नमय सिंहासनपर विराजमान,
३७. प्रशान्त:=परम शान्त,
३८. महाहंसभैश्चामरैर्वीज्यमानः-महान् हंसोंके समान श्वेत चामरोंसे जिनके ऊपर हवा की जाती है, ऐसे भगवान्,
३९. चलच्छत्रमुक्तावली शोभमानः हिलते हुए श्वेतच्छत्र तथा मुक्ताको मालाओंसे शोभित होनेवाले ॥ १७ ॥
४०. सुखी-आनन्दस्वरूप,
४१. कोटिकंदर्य लीलाभिरामः-करोड़ों कामदेवोंके समान ललित लीलाओंके कारण अतिशय मनोहर,
४२. क्वणन्त्रू पुरालंकृताङ्घ्रिः=झंकारते हुए नूपुरोंसे अलंकृत चरणवाले,
४३. शुभाङ्घ्रि:-शुभ लक्षणसम्पन्न पैरवाले, ४४. सुजानु:-सुन्दर घुटनोंवाले
४५. रम्भाशुभोरुः =केलेके समान परम सुन्दर ऊरुयुगल (जाँघ) वाले,
४६. कृशाङ्ग: दुबले-पतले,
४७. प्रतापी-तेजस्वी एवं प्रतापशाली,
४८. इभशुण्डासुदोर्दण्डखण्डः= हाथीकी सूँड़के समान सुन्दर भुजदण्डमण्डलवाले ॥ १८ ॥
४९. जपापुष्पहस्तः=अड़हुलके फूलके समान लाल-लाल हथेलीवाले,
५०. शातोदरश्रीः-पतली कमरकी शोभासे सम्पन्न,
५१. महापद्मवक्षःस्थल: वक्षःस्थलमें प्रफुल्ल विशाल कमलकी मालासे अलंकृत, अथवा जिनका हृदयकमल विशाल है, ऐसे.
५२. चन्द्रहासः= जिनके हँसते समय चन्द्रमाकी
चाँदनीकी-सी छटा छिटक जाती है, ऐसे,
५३. लसत्कुन्ददन्तः = शोभामयी कुन्दकलिकाके समान उज्ज्वल दाँतवाले,
५४. बिम्बाधरश्री:-जिनके अधरकी शोभा पक्क बिम्ब-फलसे अधिक अरुण है, ऐसे,
५५. शरत्पद्यनेत्र: शरत्कालके प्रफुल्ल कमलके सदृश नेत्रवाले,
५६. किरीटोज्ज्वलाभः- कान्तिमान् किरीटकी उज्ज्वल आभा धारण करनेवाले ॥ १९ ॥
५७. सखीकोटिभिर्वर्तमानः करोड़ों सखियोंके साथ रहकर शोभा पानेवाले,
५८. निकुञ्जे प्रियाराधया राससक्तः निकुञ्जमें प्राणवल्लभा श्रीराधाके साथ रास लीलामें तत्पर,
५९. नवाङ्गः अपने दिव्य अङ्गोंमें नित्य नूतन रमणीयता धारण करनेवाले,
६०. धराब्रह्मरुद्रा दिभिः प्रार्थितः सन् धराभारदूरीक्रियार्थं प्रजातः- पृथ्वी, ब्रह्मा तथा रुद्र आदि देवताओंकी प्रार्थना सुनकर भूमिका भार दूर करनेके लिये अवतार ग्रहण करनेवाले ॥ २० ॥
६१. यदु:- यादवकुलके प्रवर्तक राजा यदु जिनकी विभूति है, वे,
६२. देवकीसौख्यदः देवकीको सुख देनेवाले,
६३. बन्धनच्छित् भवबन्धनका उच्छेद करनेवाले अथवा अवतारकालमें माता-पिताके बन्धनको काट देनेवाले,
६४. सशेष:- शेषावतार बलरामजीके साथ विराजमान,
६५. विभु:-व्यापक अथवा सर्वसमर्थ,
६६. योगमायी-योगमायाके प्रवर्तक तथा स्वामी,
६७. विष्णुः व्यापक या वैकुण्ठनाथ विष्णुस्वरूप,
६८. व्रजे नन्दपुत्रः-व्रज मण्डलमें नन्दनन्दनके रूपमें लीला करनेवाले,
६९. यशोदासुताख्यः = यशोदाजीके पुत्ररूपमें विख्यात,
७०. महासौरख्यदः महान् सौख्य प्रदान करनेवाले
७१. बालरूपः शिशुरूपधारी,
७२. शुभाङ्ग:-सुन्दर एवं शुभ लक्षणसम्पन्न शरीरवाले ॥ २१ ॥
७३. पूतनामोक्षदः- पूतनाको मोक्ष देनेवाले, मनोहर रूपवाले,
७४. श्यामरूप:- श्यामः
७५. दयालुः कृपालु,
७६. अनोभञ्जनः शकट भङ्ग करनेवाले,
७७. पल्लवामिः नूतन पल्लवोंके समान कोमल एवं अरुण चरणवाले,
७८. तृणावर्त संहारकारी तृणावर्तका संहार करनेवाले,
७९. गोपः गोपालरूप,
८०. यशोदायशः- यशोदाके यशरूप,
८१. विश्वरूपप्रदर्शी-माताको अपने मुखमें (तथा अर्जुन, धृतराष्ट्र और उत्तङ्कको) सम्पूर्ण विश्वरूपका दर्शन करानेवाले ॥ २२ ॥
८२. गर्गदिष्टः= गर्गजीके द्वारा जिनका नामकरण संस्कार एवं भावी फलादेश किया गया, ऐसे,
८३. भाग्योदयश्रीः=भाग्योदयसूचक शोभासे सम्पन्न,
८४. लसद्वालकेलि:- सुन्दर बालोचित क्रीडा करनेवाले,
८५. सरामः बलरामजीके साथ विचरनेवाले,
८६. सुवाच: मनोहर बात करनेवाले
८७. क्वणन्नूपुरैः शब्दयुक् खनकते हुए नूपुरोंसे शब्दयुक्त,
८८. जानु हस्तैव्रजेशाङ्गणे रिङ्गमाणः घुटनों और हाथोंके बलपर ब्रजराज नन्दके आँगनमें रेंगने या चलनेवाले ॥ २३ ॥
८९. दधिस्पृक्-दहीका स्पर्श (दान) करनेवाले,
९०. हैयंगवीदुग्धभोक्ता-ताजा माखन खानेवाले और दूध पीनेवाले
९१. दधिस्तेयकृत्-व्रजाङ्गनाओंको सुख देनेके लिये दहीकी चोरी-लीला करनेवाले,
९२. दुग्धभुक् दूधका भोग आरोगनेवाले,
९३. भाण्डभेत्ता-दही-दूध आदिके आदिके मटके फोड़नेवाले,
९४. मृदं भुक्तवान् मिट्टी खानेवाले,
९५. गोपजः-नन्दगोपके पुत्र,
९६. विश्वरूपः- सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, ऐसे,
९७. प्रचण्डांशुचण्डप्रभा मण्डिताङ्गः-सूर्यकी प्रखर किरणोंसे सुशोभित शरीरवाले ॥ २४ ॥
९८. यशोदाकरैर्बन्धनप्राप्तः यशोदाके हाथों ओखलीमें बाँधे गये,
९९. आद्य आदिपुरुष या सबके आदिकारण,
१००. मणिनीवमुक्तिप्रदः कुबेरपुत्र मणिग्रीव और नलकूबरका शापसे उद्धार करनेवाले,
१०९. दामबद्धः-यशोदाद्वारा रस्सीसे बाँधे गये,
१०२. कदा ब्रजे गोपिकाभिः नृत्यमानः- कभी व्रजमें गोपिकाओंके साथ नृत्य करनेवाले,
१०३. कदा नन्दसन्नन्दकैर्लाल्यमानः कभी नन्द और सन्नन्द आदिके द्वारा लाड़ लड़ाये जानेवाले ॥ २५ ॥
१०४. कदा गोपनन्दाङ्क:- कभी गोपराज नन्दकी गोदमें समोद विराजमान,
१०५. गोपालरूपी-ग्वाल रूपधारी,
१०६. कलिन्दाङ्गजाकूलगः कलिन्द नन्दिनी यमुनाके तटपर विहार करनेवाले,
१०७. वर्त मानः- नित्य सत्तावाले,
१०८. घनैर्मास्तैश्छन्न भाण्डीरदेशे नन्दहस्ताद् राधया गृहीतो वरः एक समय प्रचण्ड वायु और घने बादलोंसे आच्छादित भाण्डीरवनके प्रदेशमें नन्दजीके हाथसे श्रीराधाद्वारा गृहीत वरस्वरूप ॥ २६ ॥
१०९. गोलोकलोकागते महारत्नसंधैर्युते कदम्बावृते निकुञ्जे राधिकासद्विवाहे ब्रह्मणा प्रतिष्ठानगतः = गोलोक-धामसे आये महान् रत्नसमूहोंसे शोभित तथा कदम्ब वृक्षोंसे आवृत निकुञ्जमें राधिकाजीके साथ विवाहके अवसरपर ब्रह्माजीके द्वारा सादर स्थापित
११०. साममन्त्रैः पूजितः = सामवेदके मन्त्रोंद्वारा पूजित ॥ २७ ॥
१११. रसी-विविध रसोंके अधिष्ठान, परम रसिक,
११२. मालतीनां वनेऽपि प्रियाराधया सह राधिकार्थ रासयुक्-मालती वनमें भी प्रियतमा राधिकाके साथ उन्हींको सुख पहुँचानेके लिये रास विलासमें संलग्न
११३. स्मेशः धरानाथ:- लक्ष्मीके पति और पृथ्वीके स्वामी,
११४. आनन्दद: आनन्द प्रदान करनेवाले,
११५. श्रीनिकेत:-रमानिवास,
११६ वनेशः वृन्दावनके स्वामी,
११७. धनी सीमातीत धन और ऐश्वर्यके स्वामी,
११८. सुन्दर: अप्रतिम सौन्दर्यकी निधि,
११९. गोपिकेश: गोपाङ्गनाओंक प्राणवल्लभ ॥ २८ ॥
१२०. कदा राधया नन्दगेहे प्रापितः किसी समय राधिकाद्वारा नन्दके घरमें पहुँचाये गये,
१२१. यशोदाकरैर्लालितः यशोदाके हाथों दुलारे गये,
१२२. मन्दहासः मन्द-मन्द मनोरम हाससे सुशोभित,
१२३. क्वापि भयी कहीं-कहीं डरे हुएकी भाँति लीला करनेवाले,
१२४. वृन्दारकारण्यवासी वृन्दावनमें निवास करनेवाले,
१२५. महामन्दिरे वासकृत्- नन्दरायके विशाल भवनमें रहनेवाले,
१२६. देव-पूज्य:-देवताओंके पूजनीय ॥ २९ ॥
१२७. वने वत्सचारी-वनमें बछड़े चरानेवाले,
१२८. महावत्सहारी-महान् बछड़ेका रूप धारण करके आये हुए वत्सासुरके विनाशक,
१२९. बकारि: बकासुरके शत्रु
१३०. सुरैः पूजितः देवगणोंद्वारा सम्मानित,
१३१. अघारिनामा- अघासुरका वध करके
वनमें नूतन बछड़ोंकी सृष्टि करनेवाले,
१३३. गोपकृत्नूतन ग्वाल-बालोंका निर्माण करनेवाले,
१३४. गोपवेश:- ग्वालवेषधारी,
१३५. कदा ब्रह्मणा संस्तुतः किसी समय ब्रह्माजीके मुखसे अपना गुणगान सुननेवाले,
१३६. पद्मनाभः- एकार्णवके जलमें अपनी नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले ॥ ३० ॥
१३७. विहारी- वृन्दावनमें विचरण करनेवाले और भक्तोंके साथ नाना प्रकार विहार करनेवाले,
१३८. तालभुक् →ताड़का खानेवाले फल ,
१३९. धेनुकारि:-धेनुकासुरके शत्रु
१४०. सदा रक्षकः सदा सबके रक्षक,
१४१. गोविषार्ति प्रणाशी यमुनाजीका विषाक्त जल पीनेसे गौओंके भीतर व्याप्त विषजनित पीड़ाका नाश करनेवाले, कलिन्दाङ्गजाकूलगः कलिन्द-कन्या यमुनाके तटपर जानेवाले,
१४२. कालियस्य दमी कालियनागका दमन करनेवाले,
१४३. फणेषु नृत्यकारी कालियनागके फणोंपर नृत्य करनेवाले,
१४४. प्रसिद्धः सर्वत्र प्रसिद्धिको प्राप्त ॥ ३१ ॥
१४५. सलील:- लीलापरायण,
१४६. शमी शान्त,
१४७. ज्ञानद:- ज्ञानदाता,
१४८. कामपूरः- कामनाओंके पूरक,
१४९. गोपयुक्-गोपोंके विराजमान,
१५४. स्वभावतः
१४८. साथ
१५०. गोप: गोपस्वरूप या गौओंके पालक,
१५१. आनन्दकारी आनन्ददायिनी लीला प्रस्तुत करनेवाले,
१५२. स्थिरः स्थैर्ययुक्त,
१५३. अग्निभुक् दावानलको पी जानेवाले,
१५४. पालक:-रक्षक,
१५५. बाललील: बालकों-जैसी क्रीडा करनेवाले,
१५६. सुराग: मुरलीके स्वरोंमें सुन्दर राग गानेवाले,
१५७. वंशीधर: मुरलीधारी,
१५८. पुष्पशील: स्वभावतः फूलोंका शृङ्गार धारण करनेवाले ॥ ३२ ॥
१५९. प्रलम्बप्रभानाशक:- बलरामरूपसे प्रलम्बासुरकी प्रभाके नाशक,
१६०. गौरवर्ण:- गोरे वर्णवाले बलराम,
१६१. बल:- बलस्वरूप या बलभद्र
१६२. रोहिणीज: रोहिणीनन्दन,
१६३. रामः बलराम,
१६४. शेष: शेषके अवतार,
१६५. बली-बलवान्,
१६६. पद्मनेत्रः कमलनयन,
१६७. कृष्णाग्रजः = श्रीकृष्णके बड़े भाई,
१६८. धरेशः धरणीधर,
१६९. फणीश: नागराज,
१७०. नीलाम्बराभः = नीलवस्त्रकी शोभासे युक्त ॥ ३३ ॥
महासौख्यदः = महान् सौख्य देनेवाले,
१७१. अग्निहारकः मुञ्जाटवीमें लगी हुई आगको हर लेनेवाले,
१७२. व्रजेशः व्रजके स्वामी,
१७३. शरद्ग्रीष्मवर्षाकरः- शरद् ग्रीष्म और वर्षा प्रकट करनेवाले
१७४. कृष्णवर्णः- श्यामसुन्दर,
१७५. व्रजे गोपिकापूजितः व्रजमण्डलमें गोप सुन्दरियोंद्वारा पूजित
१७६. चीरहर्ता - चीरहरणकी लीला करनेवाले
१७७. कदम्बे स्थितः चीर लेकर कदम्बपर जा बैठनेवाले,
१७८. चीरद:- गोपकिशोरियों के माँगनेपर उन्हें चीर लौटा देनेवाले,
१७९. सुन्दरीश: सुन्दरी गोपकुमारियोंके प्राणेश्वर ॥ ३४ ॥
१८०. क्षुधानाशकृत्-ग्वाल-बालोंकी भूख मिटानेवाले,
१८९. यज्ञपत्नीमनः स्पृक्-यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंकी पत्नियोंके मनका स्पर्श करनेवाले उनके मन-मन्दिरमें बस जानेवाले,
१८२. कृपाकारक: दया करनेवाले,
१८३. केलिकर्ता-क्रीडापरायण,
१८४. अवनीशः- भूस्वामी,
१८५. व्रजे शक्रयाग प्रणाशः व्रजमण्डलमें इन्द्रयागकी परम्पराको मिटा देनेवाले,
१८६. अमिताशी- गोवर्धन पूजामें समर्पित अपरिमित भोजन राशिको आरोग लेनेवाले,
१८७. शुनासीरमोहप्रदः इन्द्रको मोह प्रदान करनेवाले अथवा उनके मोहका खण्डन करनेवाले,
१८८. बालरूपी बालरूपधारी ॥ ३५ ॥
१८९. गिरे: पूजकः - गिरिराज गोवर्धनकी पूजा करनेवाले
१९० नन्दपुत्रः नन्दरायजीके बेटे,
१९९. अगधः- गिरिवरधारी,
१९२. कृपाकृत- कृपा करनेवाले,
१९३. गोवर्धनोद्धारिनामा= 'गोवर्धनोद्धारी' नामवाले,
१९४. वातवर्षाहर:- आँधी और वर्षाके कष्टको हर लेनेवाले,
१९५. रक्षक: व्रजवासियोंकी रक्षा करनेवाले
१९६. व्रजाधीश गोपाङ्गनाशङ्कित:- व्रजराज नन्द और गोपाङ्गनाओंसे डरनेवाले, अथवा गोवर्धन उठाने के अलौकिक कर्मको देखकर वजराज नन्द तथा गोपियोंको जिनके प्रति यह शङ्का हुई थी कि ये साधारण गोप नहीं, साक्षात् नारायण लानेवाले, हो सकते हैं, इस तरहकी शङ्काके पात्र ॥ ३६ ॥
१९७. अगेन्द्रोपरि शक्रपूज्य:- गिरिराज गोवर्धन के ऊपर इन्द्रके द्वारा पूजनीय,
१९८. प्राक्स्तुतः = पहले जिनका स्तवन हुआ है, ऐसे,
१९९. मृषा शिक्षक:- अपने ऊपर शङ्का करनेवाले नन्दादि गोपोंको व्यर्थकी बातों से बहला देनेवाले,
२००. देवगोविन्द नामा- 'गोविन्ददेव' नाम धारण करनेवाले,
२०१. व्रजाधीशरक्षाकरः = ब्रजराज नन्दकी रक्षा करनेवाले (उन्हें वरुणलोकसे छुड़ाकर
२०२. पाशिपूज्य: = पाशधारी वरुणके द्वारा पूजनीय,
२०३. अनुगैगोंपजैः दिव्यवैकुण्ठदर्शी- अनुगामी ग्वालबालोंके साथ जाकर उन्हें दिव्य वैकुण्ठधामका दर्शन करानेवाले ॥ ३७ ॥
२०४. चलच्चारुवंशीक्वणः मनोहर वंशीकी ध्वनिको चारों ओर फैलानेवाले,
२०५. कामिनीशः = गोप- सुन्दरियोंके प्राणेश्वर,
२०६. व्रजे कामिनी मोहदः व्रजकी कामिनियोंको मोह प्रदान करनेवाले,
२०७. कामरूपः कामदेवसे भी सुन्दर रूपवाले,
२०८. रसाक्त: - रसमग्र,
२०९. रसी रासकृत् रासक्रीडा करनेवाले रसोंके निधि,
२१०. राधिकेश: राधिकाके स्वामी,
२११. महामोहदः महान् मोह प्रदान करनेवाले,
२१२. मानिनीमानहारी मानिनियों के मान हर लेनेवाले ॥ ३८ ॥
२१३. विहारी वरः = विहारशील श्रेष्ठ पुरुष,
२१४. मानहत मान हर लेनेवाले,
२१५. राधिकाङ्क: श्रीराधिका जिनकी वामाङ्गस्वरूपा हैं, वे
२१६. धराद्वीपगः= भूमण्डलके सभी द्वीपोंमें जानेवाले,
२१७. खण्डचारी - विभिन्न वनखण्डोंमें विचरनेवाले,
२१८. वनस्थः वनवासी,
२१९. प्रियः = सबके प्रियतम,
२२०. अष्टवक्रर्षिद्रष्टा-अष्टावक्र ऋषिका दर्शन करनेवाले,
२२१. सराध:- राधिकाके साथ विचरनेवाले,
२२२. महामोक्षदः- महामोक्ष प्रदान करनेवाले, २२३. प्रियार्थं पद्महारी- प्रियतमाकी प्रसन्नताके लिये कमलका फूल लानेवाले ॥ ३९ ॥
२२४. वटस्थ :- वटवृक्षपर विराजमान,
२२५. सुर: देवता,
२२६. चन्दनाक्तः चन्दनसे चर्चित,
२२७. प्रसक्तः = श्रीराधाके प्रति अधिक अनुरक्त,
२२८. राधया व्रजं ह्यागतः श्रीराधाके साथ व्रज मण्डलमें अवतीर्ण,
२२९. मोहिनीषु महामोहकृत् मोहिनियोंमें महामोह उत्पन्न करनेवाले,
२३०. गोपिका गीतकीर्तिः गोपिकाओंद्वारा गायी गयी कीर्तिवाले,
२३१. रसस्थ:- अपने स्वरूपभूत रसमें स्थित, २३२. पटी-पीताम्बरधारी,
२३३. दुःखिता कामिनीशः दुखिया नारियोंके रक्षक ॥ ४० ॥
२३४. वने गोपिकात्यागकृत्-वनमें गोपियोंका त्याग करनेवाले,
२३५. पादचिह्नप्रदर्शी वनमें ढूँढ़ती हुई गोपिकाओंको अपना चरणचिह्न प्रदर्शित करनेवाले,
२३६. कलाकारकः चौसठ कलाओंके कलाकार,
२३७. काममोही- अपने रूप-लावण्यसे कामदेवको भी मोहित करनेवाले,
२३८. वशी-मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले,
२३९. गोपिकामध्यगः गोपाङ्गनाओंके बीचमें विराजमान,
२४०. पेशवाच: मधुरभाषी,
२४१. प्रियाप्रीतिकृत् प्रिया श्रीराधासे प्रेम करनेवाले अथवा प्रियाकी प्रसन्नताके लिये कार्य करनेवाले,
२४२. रासरक्त:- रासके रंगमें रँगे
२४३. कलेशः कलाओंके सम्पूर्ण स्वामी ॥ ४१ ॥
२४४. रसारक्तचित्तः रसमग्न चित्तवाले,
२४५. अनन्तस्वरूप :- अनन्त रूपवाले अथवा शेषनाग स्वरूप,
२४६. स्रजासंवृतः आजानुलम्बिनी वनमाला धारण करनेवाले,
२४७. वल्लवीमध्यसंस्थ: गोपाङ्गनामण्डलके मध्य बैठे हुए,
२४८. सुबाहु:- सुन्दर बाँहवाले, सुपाद:- सुन्दर चरणवाले,
२५०. सुवेश:- सुन्दर वेशवाले,
Comments
Post a Comment