10.अश्वमेध खण्ड || अध्याय 11 || ऋत्विजों का वरण-पूजन; श्यामकर्ण अश्व का आनयन
10.अश्वमेध खण्ड || अध्याय 11 || ऋत्विजों का वरण-पूजन; श्यामकर्ण अश्व का आनयन और अर्चन; ब्राह्मणों को दक्षिणादान; अश्व के भालदेश में बँधे हुए स्वर्णपत्र पर गर्गजी के द्वारा उग्रसेन के बल-पराक्रम का उल्लेख तथा अनिरूद्ध को अश्व की रक्षा के लिए आदेश
1. मिष्ठान्न (इमरती या जलेबी आदि) एक मधुर खाद्य पदार्थ का नाम।
श्रीगर्गजी कहते हैं- तदनन्तर सुधर्मा-सभा में वासुदेव से प्रेरित हो राजा उग्रसेन ने वहाँ पधारे हुए ऋत्विजनों को मस्तक झुकाकर प्रणाम करके प्रसन्न किया और विधिवत उन सबका वरण किया। पराशर, व्यास, देवल, च्यवन, उसित, शतानन्द, गालव, याज्ञवल्क्य, बृहस्पति, अगस्त्य, वामदेव, मैत्रेय, लोमश, कवि (शुक्राचार्य), मैं (गर्ग), क्रतु, जैमिनी, वैशम्पायन, पैल, सुमन्तु, कण्व, भृगु, परशुराम, अकृतव्रण, मधुच्छनदा, वीतिहोत्र, कवष, धौमय, आसुरि, जाबाली, वीरसेन, पुलस्त्य, पुलह, दूर्वासा, सरीचि, एकत, द्वित, त्रित, अंगिरा, नारद, पर्वत, कपिलमुनि, जातूकर्ण, उतथ्य, संवर्त, ऋष्यभंग, शाण्डिल्य, प्राड्विपाक, कहोड, सुरत, मुनु, कच, स्थूलीशिरा, स्थूलाक्ष, प्रति-मर्दन, बकदाल्भ्य, कौण्डिन्य, रैभ्य, द्रोण, कृप, प्रकटाश, यवक्रीत, वसुधन्वा, मित्रभू, अपान्तरतमा, दत्तामेत्र, महामुनि, मार्कण्डेय, जमदग्नि, कश्यप, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, मुनि वशिष्ठ, विश्वामित्र, पतंजली, कात्यायन, पाणिनी और वाल्मिकि आदि ऋत्विजों का यादवराज उग्रसेन ने पूजन किया। नरेश्वर ! वे सभी निमन्त्रित ऋत्विज बड़े प्रसन्न होकर राजा से बोले।
मुनियों ने कहा- देव दावन वन्दित महाराज उग्रसेन ! तुम यज्ञ का आरम्भ करो। श्रीकृष्ण की कृपा से वह अवश्य पूर्ण होगा। उन महर्षियों का वचन सुनकर अन्धककुल के स्वामी राजा उग्रसेन की सम्पूर्ण इन्द्रियां संतुष्ट हो गयीं। उन्होंने यज्ञ की सारी सामग्री एकत्र की। तदनंतर ब्राह्मणों ने सोने के हलों से यज्ञ की भूमि जोती तथा पिण्डारक तीर्थ के समीप विधिपूर्वक राजा को यज्ञ की दीक्षा दी। चार योजन तक की विशाल भूमि को जोतकर राजा ने वहाँ यज्ञ के लिए मण्डप बनवाये। योनि और मेखला से युक्त मध्यकुण्ड का निर्माण करके उसमें विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना की। व्रजभान ! मेरे कहने से राजा उग्रसेन ने अनेक रत्नों से विभूषित और ध्वजा-पताकाओं से मण्डित सभा मण्डल बनवाया। उस सभाभवन को देखकर श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र से कहा।
श्रीकृष्ण बोले- प्रद्युम्न ! मेरी बात सुनो और सुनकर तत्काल उसका पालन करो। जाओ, शस्त्रधारी शूरवीरों के साथ यत्नपूर्वक अश्वमेधीय अश्व को यहाँं लेकर आओ।
श्रीगर्गजी कहते हैं- श्रीहरि का यह आदेश सुनकर धनुर्धरों में श्रेष्ठ प्रद्युम्न ‘बहुत-अच्छा’ कहकर घोड़ा लाने के लिये घुड़साल में गये। नरेश्वर ! तदनन्तर श्रीकृष्ण ने उस अश्व की रक्षा केलिये अपने पुत्र भानु और साम्ब आदि को अश्वशाला में भेजा। अश्वशाला में जाकर बलवान रूक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न ने सोने की सांकल में बँधे हुए सहस्त्रों श्यामकर्ण अश्व को देखकर उनमें से एक यज्ञ के योग्य अश्व को अपने हाथ से हंसते हुए अनायास ही बन्धन मुक्त कर दिया। बन्धन मुक्त छूटने पर वह अश्व धीरे-धीरे अश्वशाला से बाहर निकला। उसका मुख लाल, पूँछ पीली और कान श्यामकर्ण के थे। मुक्ताफलों की मालाओं से सुशोभित वह दिव्य अश्व अत्यन्त मनोहर दिखायी देता था। वह श्वेत छत्र से युक्त और चामरों से अलंकृत था। उसके आगे, पीछे, और बीच में उपस्थित श्रीहरि के पुत्र उस अश्वराज की उसी प्रकार सेवा करते थे जैसे समस्त देवता श्रीहरि की। अन्यान्य मण्डलेश्वरों से भी सुरक्षित हुआ वह अश्व भूतल को अपनी टापों से खोदता हुआ सभामण्डप के पास आया। राजन ! श्यामकर्ण अश्व को वहाँ देख राजा उग्रसेन ने प्रसन्न होकर मुझे आवश्यक विधि का सम्पादन करने के लिये भेजा। तब मैंने रानी रुचिमति सहित महाराज उग्रसेन को योग्य आसन पर बिठाकर पिण्डारक तीर्थ में धर्म के अनुसार समस्त प्रयोग करवाया। राजा उग्रसेन चैत्र मास की पूर्णिमा को मृगचर्म धारण किये यज्ञ के लिये दीक्षित हुए।
राजन ! उन्होंने मेरी आज्ञा से ‘असिपत्र-व्रज’ का नियम लिया। नरेश्वर ! मैं यादवेन्द्रकुल का पूर्वगुरु होने के कारण उस यज्ञ में समस्त ब्राह्मणों का आचार्य बनाया गया। तदनन्तर भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से समस्त ब्राह्मण वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हुए अपने-अपने आसन पर बैठे। उन सबने गणेश आदि देवताओं का पृथक-पृथक पूजन किया। राजन ! फिर सब मुनियों ने अश्व की स्थापना करके उस पर केसर, चन्दन, फूलमाला और चावल चढ़ाये, धूप निवेदित किये। सुधा [1] कुण्डलिका आदि का नैवेद्य लगाया और आरती आदि के द्वारा उस अश्व की विधिपूर्वक पूजा करके राजा को दान के लिये प्रेरित किया। उनका यह आदेश सुनकर उग्रसेन ने शीघ्रतापूर्वक वहले मुझे धन का दान किया। एक लाख घोड़े, एक हजार हाथी, दो हजार रथ, एक लाख दुधारू गाय और सौ भार सुवर्ण-इतनी दक्षिणा राजा ने मुझको दी। राजन ! तदनन्तर निमन्त्रित ब्राह्मणों को महाराज उग्रसेन ने जो शास्त्रोक्त दक्षिणा दी, उसका वर्णन सुनो। प्रत्येक को एक हजार घोड़े, दो सौ हाथी, दो सौ रथ और बीस भार सुवर्ण इतनी दक्षिणा दी गयी। तत्पश्चात जो अनिमन्त्रित ब्राह्मण आये थे, उनको नमस्कार करके राजा ने विधिपूर्वक एक हाथी, एक रथ, एक गौ, एक भार सुवर्ण और एक घोड़ा-इतनी दक्षिणा प्रत्येक ब्राह्मण के लिये दी। इस प्रकार दान करके घोड़े के ललाट पर, जो कुंकुम आदि के कारण अत्यंत कमनीय दिखायी देता था, राजा ने सोने का पत्र बांधा। उस पत्र पर मैंने सभामण्डप में समस्त यादवों के समक्ष महाराज उग्रसेन के बढ़े-चढ़े बल पराक्रम तथा प्रताप का इस प्रकार उललेख किया।
चन्द्रवंश के अन्तर्गत यदुकुल में राजा उग्रसेन विराजमान हैं, जिनके आदेश का इन्द्र आदि देवता भी अनुसरण करते हैं। भक्तपाल भगवान श्रीकृष्ण जिनके सहायक हैं और उन्हीं की भक्ति से बँधकर वे श्रीहरि सदा द्वारकापुरी में निवास करते हैं। उन्हीं की आज्ञा से चक्रवर्ती राजाधिराज उग्रसेन अपने यश का विस्तार करने के लिये हठात अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। उन्होंने ही यह अश्वों में श्रेष्ठ शुभलक्षण-सम्पन्न श्यामकर्ण घोड़ा छोड़ा है। इस अश्व के रक्षक हैं, श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध, जिन्होंने ‘वृक’ दैत्य का वध किया था।
वे हाथी, घोड़े, रथ और पैदल-वीरों की चतुरंगिणी सेनाओं के साथ हैं। इस भूतलपर जो-जो राजा राज्य करते हैं और अपने को शूरवीर मानते हैं, वे सब स्वर्णपत्रशोभित अश्वमेधीय अश्व को अपने बल से रोकें। धर्मात्मा अनिरूद्ध अपने बाहुबल और पराक्रम से हठपूर्वक अनायास ही राजाओं द्वारा पकड़े गये इस अश्व को छुड़ा लेंगे। जो धनुर्धर नरेश इस अश्व को नहीं पकड़ सके, वे अनिरूद्धजी के चरणों में प्रणाम करके सकुशल लौट जायँ’। जब इस प्रकार स्वर्णपत्र लिख दिया गया, तब श्रेष्ठ यदुवंशी वीरों ने शंख बजाये। झांझ, मृदंग, नगाड़े और गोमुख आदि बाजे बज उठे। गन्धर्वगण श्रीकृष्ण और बलदेव के मंगलमय चरित्रों का गान करने लगे और अप्सरायें भी वहाँ आनन्दविभोर होकर नृत्य करने लगीं। तदनन्तर भगवान श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न होर यादवराज उग्रसेन के सामने ही वहाँ खड़े हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरूद्ध को उस यज्ञ सम्बन्धी अश्व के सर्वथा संरक्षण का आदेश दिया।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध चरित्र सुमेरू में ‘अश्व को पूजन’ विषयक ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ।
1. मिष्ठान्न (इमरती या जलेबी आदि) एक मधुर खाद्य पदार्थ का नाम।
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