10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59B || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन (251 से 500 तक)

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59B || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन

 भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन
                 (251 से 500 तक)

२५१. सुकेशो व्रजेश: सुन्दर केशवाले व्रजमण्डलके स्वामी, 
२५२. सखा सख्य-रतिके आलम्बन, 
२५३. वल्लभेशः प्राणवल्लभा श्रीराधाके हृदयेश, 
२५४. सुदेश :- सर्वोत्कृष्ट देशस्वरूप ॥ ४२ ॥ २५५. कणत्किङ्किणीजालभृत् → झनकारती किङ्किणीकी लड़ों को धारण करनेवाले,
२५६. नूपुराढ्यः = चरणोंमें नूपुरोंकी शोभासे सम्पन्न, 
२५७. लसत्कङ्कणः - कलाइयोंमें सुन्दर कंगन धारण करनेवाले, 
२५८. अङ्गदी- बाजूबंदधारी, 
 २५९. हारभार:- हारोंके भारसे विभूषित, 
२६०. किरीटी=मुकुटधारी,
२६१. चलत्कुण्डलः कानोंमें हिलते हुए कुण्डलोंसे सुशोभित, 
२६२. अङ्गुलीयस्फुरत्कौस्तुभः-हाथोंमें अंगूठीके साथ वक्षःस्थलपर जगमगाती हुई कौस्तुभमणि धारण करनेवाले, 
२६३. मालतीमण्डिताङ्गः = मालतीकी मालासे अलंकृत शरीरवाले ॥ ४३ ॥
२६४. महानृत्यकृत्-महारास नृत्य करनेवाले, 
२६५. रासरङ्गः = रासरंगमें तत्पर, 
२६६. कलाढ्य : समस्त कलाओंसे सम्पन्न, 
२६७. चलद्धारभः = हिलते हुए रत्नहारकी छटा छिटकानेवाले, 
२६८. भामिनी नृत्ययुक्तः भामिनियोंके साथ नृत्यमें संलग्न,
२६९. कलिन्दाङ्गजाकेलिकृत्- कलिन्दनन्दिनी यमुनाजीके जलमें क्रीडा करनेवाले, 
२७०. कुङ्कुमश्रीः केसर-कुङ्कुमकी शोभासे सम्पन्न, 
२७१. सुरैर्नायिका नायकैर्गीयमानः = नायिकाओं के नायक, अर्थात् अपनी प्राणवल्लभाओंके साथ सुशोभित देवताओंद्वारा जिनके यशका गान किया जाता है, वे ॥ ४४ ॥
२७२. सुखाढ्यः = स्वरूपभूत सुखसे सम्पन्न, २७३. राधापतिः- राधिकाके प्राणवल्लभ, 
२७४. पूर्ण बोधः = पूर्ण ज्ञानस्वरूप, 
२७५. कटाक्षस्मिती कुटिल कटाक्षके साथ मन्द मुस्कान शोभा प्रकट करनेवाले, 
२७६. वल्गित भ्रूविलासः नचायी हुई भौंहों के विलाससे शोभायमान, 
२७७. सुरम्य: = रमणीय, 
२७८. अलिभिः कुन्तलालोलकेशः मँडराते भ्रमरोंसे युक्त कुछ हिलते घुँघराले केशवाले, 
२७९. स्फुरद्वई कुन्दस्त्रजाचारुवेशः = फरफराते हुए मोरपंखके मुकुट और कुन्दकुसुमोंकी मालासे मनोहर वेषवाले ॥ ४५ ॥ 
२८०. महासर्पतो नन्दरक्षापराङ्घ्रिः = जिनके चरण महान् अजगरके भयसे नन्दकी रक्षा करनेवाले हैं, वे, 
२८१. सदा मोक्षदः →सतत मोक्ष प्रदान करनेवाले, 
२८२. शङ्खचूडप्रणाशी- 'शङ्खचूड़' नामक यक्षको मार भगानेवाले, 
२८३.प्रजारक्षकः - प्रजाजनों के प्रतिपालक, 
२८४. गोपिकागीयमानः = गोपाङ्गनाओंद्वारा जिनके यशका गान किया जाता है, वे, 
२८५. कुद्मिप्रणाशप्रयासः अरिष्टासुरके वधके लिये प्रयास करनेवाले, 
२८६. सुरेज्य:- देवताओंके नूजनीय ॥ ४६ ॥


२८७. कलिः कलिस्वरूप, 
२८८. क्रोधकृत् दुष्टोंपर क्रोध करनेवाले, 
२८९. कंसमन्त्रोपदेष्टा= नारदरूपसे कंसको मन्त्रोपदेश करनेवाले,
२९०. अक्रूरमन्त्रोपदेशी = अक्रूरको अपने नाम-मन्त्रका उपदेश करनेवाले अथवा उनको मन्त्रणा देनेवाले, 
२९१. सुरार्थः- देवताओंका प्रयोजन सिद्ध करनेवाले, 
२९२. बली केशिहा - केशीका नाश करनेवाले महान् बलवान्, 
२९३. पुष्पवर्षामलश्रीः देवताओंद्वारा जिनपर पुष्पवर्षा की गयी है, वे भगवान्, 
२९४. अमलश्रीः = उज्ज्वल शोभासे सम्पन्न, 
२९५. नारदादेशतो व्योमहन्ता- नारदजीके कहनेसे व्योमासुरका वध करनेवाले ॥ ४७ ॥
२९६. अक्रूरसेवापर:- नन्द व्रजमें आये हुए अक्रूरकी सेवामें संलग्न, 
२९७. सर्वदर्शी - सबके द्रष्टा, 
२९८. व्रजे गोपिकामोहदः ब्रजमें गोपाङ्गनाओंको मोहित करनेवाले, 
२९९. कूलवर्ती यमुनाके तटपर विद्यमान, 
३०० सतीराधिकाबोधदः = मथुरा जाते समय सती राधिकाको बोध (आश्वासन) देनेवाले, 
३०१. स्वप्रकर्ता श्रीराधिकाके लिये सुखमय स्वप्रकी सृष्टि करनेवाले, 
३०२. विलासी लीला-विलास परायण, 
३०३. महामोहनाशी- महामोहके नाशक, 
३०४. स्वबोधः आत्मबोधस्वरूप ॥ ४८ ॥
३०५. व्रजे शापतस्त्यक्तराधासकाशः व्रजमें शापवश राधाके समीप निवासका त्याग करनेवाले, 
३०६. महामोहदावाग्निदग्धापतिः = श्रीकृष्णविषयक महामोहरूप दावानलसे दग्ध होनेवाली श्रीराधाके पालक या प्राणरक्षक, 
३०७. सखीबन्धनान्मोचिता क्रूरः सखियोंके बन्धनसे अक्रूरको छुड़ानेवाले, 
३०८. आरात् सखीकङ्कणैस्ताडिताक्रूररक्षी निकट आयी हुई सखियोंके कंगनोंकी मारसे पीड़ित अक्रूरकी रक्षा करनेवाले ॥ ४९ ॥
३०९. व्रजे राधयारथस्थः व्रजमें राधाके साथ रथपर विराजमान, 
३१०. कृष्णचन्द्रः = श्रीकृष्णचन्द्र, 
३११. गोपकैः सुगुप्तो गमी ग्वाल-बालोंके साथ अत्यन्त गुप्तरूपसे मथुराकी यात्रा करनेवाले, 
३१२. चारुलीलः = मनोहर लीलाएँ करनेवाले, 
३१३. जलेऽक्रूरसंदर्शितः यमुनाके जलमें अक्रूरको अपने रूपका दर्शन करानेवाले, 
३१४. दिव्यरूपः दिव्य रूपधारी, 
३१५. दिदृक्षुः- मथुरापुरी देखनेके इच्छुक, 
३१६. पुरीमोहिनीचित्तमोही-मथुरापुरीकी मोहिनी स्त्रियोंके भी चित्तको मोह लेनेवाले ॥ ५० ॥
३१७. रङ्गकारप्रणाशी-कंसके रंगकार या धोबीको नष्ट करनेवाले, 
३१८. सुवस्त्र:- सुन्दर वस्त्रधारी, 
३१९. स्स्रजी=माली सुदामाकी दी हुई माला धारण करनेवाले, 
३२०. वायकप्रीतिकृत् दर्जीको प्रसन्न करनेवाले, 
३२९. मालिपूज्यः मालीके द्वारा पूजित, 
३२२. महाकीर्तिदः- मालीको महान् सुयश प्रदान करनेवाले, 
३२३. कुब्जाविनोदी- कुब्जाके साथ हास-विनोद करनेवाले, 
३२४. स्फुरचण्ड कोदण्डरुग्णः कंसके कान्तिमान् कोदण्डका खण्डन (धनुष- भङ्ग) करनेवाले, 
३२५. प्रचण्ड: प्रचण्ड (महान् बलवान्) दिखायी देनेवाले ॥ ५१ ॥
३२६. भटार्त्तिप्रदः = कंसके मल्ल योद्धाओंको पीड़ा देनेवाले, 
३२७. कंसदुःस्वप्नकारी कंसको बुरे सपने दिखानेवाले, 
३२८. महामल्लवेश:- महान् मल्लोंके समान वेष धारण करनेवाले, 
३२९. करीन्द्र प्रहारी = गजराज कुवलयापीड़पर प्रहार करनेवाले, 
३३०. महामात्यहा महावतोंको मारनेवाले, 
३३१. रङ्गभूमिप्रवेशी-कंसकी मल्लशालामें प्रवेश करनेवाले, 
३३२. रसाढ्यः नौ रसोंसे सम्पन्न (भिन्न-भिन्न द्रष्टाओंको विभिन्न रसोंके आलम्बनके रूपमें दिखायी देनेवाले), 
३३३. यशःस्पृक् यशस्वी, 
३३४. बलीवाक्पटुश्रीः = अनन्त शक्तिसे सम्पन्न और बातचीत करनेमें प्रवीण ऐश्वर्यवान् ॥ ५२ ॥
३३५. महामल्लहा बड़े-बड़े मल्ल चाणूर और मुष्टिक आदिका वध करनेवाले, 
३३६. युद्धकृत् युद्ध करनेवाले, 
३३७. स्त्रीवचोऽर्थी- रंगोत्सव देखनेके लिये आयी हुई स्त्रियोंके वचनोंको सुननेकी इच्छावाले, 
३३८. धरानायकः कंसहन्ता कंसका हनन करने वाले भूतलके स्वामी, 
३३९. प्राग्यदुः- पूर्ववर्ती राजा यदुस्वरूप, 
३४०. सदापूजितः सदा सबसे पूजित, 
३४१. उग्रसेनप्रसिद्धः-उग्रसेनकी प्रसिद्धिके कारण,
३४२. धराराज्यद →उग्रसेन को भूमंडल का राज्य देने वाले
३४३. यादवैर्मण्डिताङ्गः=यादवोंसे सुशोभित शरीरवाले ॥ ५३ ॥
३४४. गुरोः पुत्रदः = गुरुको पुत्र प्रदान करनेवाले, 
३४५. ब्रह्मविद् ब्रह्मवेत्ता, 
३४६. ब्रह्मपाठी- वेदपाठ करनेवाले, 
३४७. महाशङ्खहा- महान् राक्षस शङ्खासुरका वध करनेवाले, 
३४८. दण्डधृक्पूज्यः= दण्डधारी यमराजके लिये पूजनीय, 
३४९. व्रजे उद्धव प्रेषिता व्रजमें वहाँका समाचार जाननेके लिये उद्धवको भेजनेवाले, 
३५०. गोपमोही-अपने रूप, गुण और सद्भावसे गोपगणोंको मोह लेनेवाले,
३५१. यशोदाघृणी - मैया यशोदाके प्रति अत्यन्त कृपालु, 
३५२. गोपिकाज्ञानदेशी-गोपाङ्गनाओंको ज्ञानोपदेश करनेवाले ॥ ५४ ॥
३५३. सदा स्नेहकृत् सदा स्नेह करनेवाले, 
३५४. कुब्जया पूजिताङ्गः कुब्जाके द्वारा पूजित अङ्गवाले, 
३५५. अक्रूरगेहंगमी-अक्रूरके घर पधारने वाले, 
३५६. मन्त्रवेत्ता - मन्त्रणाके मर्मज्ञ, 
३५७. पाण्डवप्रेषिताक्रूर:- पाण्डवोंका समाचार लानेके लिये अक्रूरको भेजनेवाले, 
३५८. सुखी सर्वदर्शी = सौख्ययुक्त, सबके साक्षी अथवा सर्वज्ञ, 
३५९. नृपानन्द कारी= राजा उग्रसेनको आनन्द देनेवाले ॥ ५५ ॥
३६०. महाक्षौहिणीहा-जरासंधका तीस अक्षौहिणी सेनाका विनाश करनेवाले, 
३६१. जरासंध मानोद्धरः = जरासंधका मान भङ्ग करनेवाले, 
३६२. द्वारकाकारकः- द्वारकापुरीका निर्माण करनेवाले, 
३६३. मोक्षकर्ता भव-बन्धनसे छुटकारा दिलाने वाले, 
३६४. रणी युद्धके लिये सदा उद्यत, 
३६५. सार्वभौमस्तुतः सत्ययुगके चक्रवर्ती राजा मुचुकुन्दने जिनकी स्तुति की, ऐसे, 
३६६. ज्ञानदाता= मुचुकुन्दको ज्ञान प्रदान करनेवाले, 
३६७. जरासंध-संकल्पकृत →जरासंधके संकल्पकी पूर्ति करनेवाले, जरासंध एक बार अपनी पराजयका अभिनय करके 
३६८. धावदङ्घ्रिः = पैदल भागनेवाले ॥ ५६ ॥
३६९. नगादुत्पतन्द्वारकामध्यवर्ती-प्रवर्षणगिरि से उछलकर द्वारकापुरीके बीच विराजमान, 
३७०. रेवती भूषण:-बलरामरूपसे रेवतीके सौभाग्यभूषण, 
३७१. तालचिह्नो यदुः तालके चिह्नसे युक्त ध्वजा 
वाले यदुवीर, 
३७२. रुक्मिणीहारक:- रुक्मिणीका अपहरण करनेवाले, 
३७३. चैद्यभेद्यः- चेदिराज शिशुपाल जिनका वध्य है, वे, 
३७४ रुक्मिरूपप्रणाशी रुक्मीकी आधी मूँछ मूँड़कर उसे कुरूप बनानेवाले,
३७५. सुखाशी- स्वरूपभूत आनन्दके आस्वादक ॥ ५७ ॥ 
३७६ अनन्तः = शेषनागस्वरूप, मारः कामदेवावतार, 
३७८. कार्षिण:- कृष्णकुमार प्रद्युम्न, 
३७९. कामः कामदेव, 
३८०. मनोजः = काम, 
३८१. शम्बरारिः शम्बरासुरके शत्रु कामदेव, 
३८२. रतीशः = रतिके स्वामी, 
३८३. रथी= रथारूढ़, 
३८४. मन्मथ:- मनको मथ देनेवाले, 
३८५. मीनकेतुः मत्स्यचिह्न ध्वजासे युक्त, 
३८६. शरी-बाणधारी, स्मरः काम, 
३८८. दर्पक:- कामदेव, 
३८९. मानहा= मानमर्दन करनेवाले, 
३९०. पञ्चवाण: पक्ष-बाणधारी कामदेव (ये सब नाम प्रद्युम्नस्वरूप श्रीहरिके पर्यायवाची हैं) ॥ ५८ ॥
३९१. प्रियः सत्यभामापतिः-सत्यभामाके प्रिय पति, 
३९२. यादवेश: - यादवोंके स्वामी, 
३९३. सत्राजित्प्रेमपूरः = सत्राजित‌के प्रेमको पूर्ण करनेवाले, 
३९४. प्रहासः - उत्कृष्ट हासवाले, 
३९५. महारत्नदः = महारत्न स्यमन्तकको ढूँढ़कर ला देनेवाले, 
३९६. जाम्बवद्युद्धकारी- जाम्बवान्से युद्ध करनेवाले, 
३९७. महाचक्रधृक् महान् सुदर्शनचक्र धारण करनेवाले, 
३९८. खड्गधृक् 'नन्दक' खड्ग धारण करनेवाले, 
३९९. रामसंधिः बलरामजीके साथ संधि करनेवाले ॥ ५९ ॥ 
४००. विहारस्थितः = लीलाविहारपरायण, 
४०१. पाण्डवप्रेमकारी- पाण्डवोंसे प्रेम करनेवाले, 
४०२. कलिन्दाङ्गजामोहनः- कालिन्दीके मनको मोह लेनेवाले, 
४०३. खाण्डवार्थी = खाण्डव-वनको अग्निदेवके लिये अर्पित करनेके इच्छुक, 
४०४. फाल्गुन प्रीतिकृत् सखा- अर्जुनपर प्रेम रखनेवाले उनके सखा, 
४०५. नग्नकर्ता-खाण्डव वनको जलाकर नम्र (शून्य) करनेवाले, 
४०६. मित्रविन्दापतिः ‘मित्रविन्दा' नामवाली अवन्तीदेशकी राजकुमारीके पति, 
४०७. क्रीडनार्थी-क्रीडा या खेलके इच्छुक ।। ६० ।।
४०८. नृपप्रेमकृत् = राजा नग्नजित्से प्रेम करनेवाले, 
४०९. सप्तरूपो गोजयी सात रूप धारण करके सात बिगड़ैल बैलोंको एक ही साथ नाथ कर काबू में कर लेनेवाले, 
४१०. सत्यापतिः = नग्नजित्कुमारी सत्याके पति, 
४११. पारिवर्ही- राजा नग्नजित‌के द्वारा दिये दहेजको ग्रहण करनेवाले, 
४१२. यथेष्टम् पूर्ण, 
४१३. नृपैः संवृतः सत्याको लेकर लौटते समय मार्गमें युद्धार्थी राजाओंद्वारा घेर लिये जानेवाले, 
४१४. भद्रापतिः- भद्राके स्वामी, 
४१५ मधोर्विलासी मधुमास चैत्रकी पूर्णिमाको रासविलास करनेवाले, 
४१६. मानिनीश:- मानिनी जनोंके प्राणवल्लभ, ४९७. जनेशः प्रजाजनोंके स्वामी ॥ ६१ ॥ 
४१८. शुनासीरमोहावृतः इन्द्रके प्रति मोह (स्नेह एवं कृपाभाव) से युक्त, 
४१९. सत्सभार्यः सती भार्यासे युक्त, 
४२०. सतार्क्ष्यः गरुडपर आरूढ़, 
४२१. मुरारिः = मुर दैत्यका नाश करनेवाले, 
४२२. पुरीसंघभेत्ता भौमासुरकी पुरीके दुर्गसमुदाय का भेदन करनेवाले, 
४२३. सुवीरः शिरः खण्डनः श्रेष्ठवीर असुरोंका मस्तक काटनेवाले, 
४२४. दैत्य नाशी- दैत्योंका नाश करनेवाले, 
४२५. शरी भौमहा सायकधारी होकर भौमासुरका वध करनेवाले, 
४२६. चण्डवेगः- प्रचण्ड वेगशाली, 
४२७. प्रवीर : उत्कृष्ट वीर ॥ ६२ ॥

४२८. धरासंस्तुतः = पृथ्वीदेवीके मुखसे अपना गुणगान सुननेवाले, 
४२९. कुण्डलच्छत्रहर्ता - अदिति के कुण्डल और इन्द्रके छत्रको भौमासुरकी राजधानीसे लेकर उसे स्वर्गलोकतक पहुँचानेवाले, 
४३०. महा रत्नयुक्= महान् मणिरत्नोंसे सम्पन्न, 
४३१. राजकन्या अभिरामः = सोलह हजार राजकुमारियोंके सुन्दर पति, 
४३२. शचीपूजितः = स्वर्गमें इन्द्रपत्नी शचीके द्वारा सम्मानित, 
४३३. शक्रजित् पारिजातके लिये होने वाले युद्धमें इन्द्रको जीतनेवाले, 
४३४. मानहर्ता = इन्द्रका अभिमान चूर्ण कर देनेवाले, 
४३५, पारि जातापहारी रमेशः पारिजातका अपहरण करनेवाले रमावल्लभ ॥ ६३ ॥

४३६. गृही चामरैः शोभितः →गृहस्थरूपमें रहकर श्वेत चँवर डुलाये जानेके कारण अतिशय शोभायमान 
४३७. भीष्मककन्यापतिः = राजा भीष्मककी पुत्र रुक्मिणीके पति 
४३८. हास्यकृत्-रुक्मिणीके साथ परिहास करनेवाले, 
४३९. मानिनीमानकारी - मानिनी रुक्मिणीको मान देनेवाले, 
४४०. रुक्मिणीवाक्पटुः= रुक्मिणीको अपनी बातोंसे रिझानेमें कुशल 
४४९. प्रेमगेहः प्रेमके अधिष्ठान, 
४४२. सतीमोहन: सतियोंको भी मोह लेनेवाले, 
४४३. कामदेवा परश्रीः-दूसरे कामदेवके समान मनोरम सुषमासे सम्पन्न ॥ ६४ ॥

४४४. सुदेष्ण: = 'सुदेष्ण' नामक श्रीकृष्ण-पुत्र, 
४४५. सुचारुः = सुचारु, 
४४६. चारुदेष्ण:- चारुदेष्ण, 
४४७. चारुदेहः- चारुदेह, 
४४८. बली चारुगुप्तः बली, चारुगुप्त, 
४४९. सुती भद्रचारुः पुत्रवान् भद्रचारु, 
४५०. चारुचन्द्रः- चारुचन्द्र, 
४५९. विचारुः विचारु, 
४५२. चारु:- चारु, 
४५३. रथी पुत्ररूपः = रथी पुत्रस्वरूप ॥ ६५ ॥

४५४. सुभानु:- सुभानु, 
४५५. प्रभानुः प्रभानु, 
४५६. चन्द्रभानु:- चन्द्रभानु, 
४५७. बृहद्भानुः बृहद्भानु, 
४५८. अष्टभानु:- अष्टभानु, 
४५९. साम्ब: साम्ब, 
४६०. सुमित्र:- सुमित्र, 
४६१. क्रतुः क्रतु, 
४६२. चित्रकेतुः - चित्रकेतु, 
४६३. वीरः अश्व सेनः = वीर अश्वसेन, 
४६४. वृष: वृष, 
४६५. चित्रगुः चित्रगु, 
४६६. चन्द्रबिम्ब:- चन्द्रबिम्ब ॥ ६६ ॥

४६७. विशङ्कुः = विशङ्कु, 
४६८. वसुः वसु, 
४६९. श्रुतः श्रुत, 
४७०. भद्रः = भद्र, 
४७१. सुबाहुः वृषः उत्तम भुजाओं युक्त वृष, 
४७२. पूर्णमासः - पूर्णमास, 
४७३. सोमः वरः श्रेष्ठ सोम, 
४७४. शान्तिः शान्ति, 
४७५. प्रघोष: प्रघोष, 
४७६. सिंहः सिंह, 
४७७. बल: ऊर्ध्वग:-बल और ऊर्ध्वग, 
४७८. वर्धनः= वर्धन, 
४७९. उन्नादः - उन्नाद ॥ ६७ ॥

४८०. महाश:- महाश, 
४८१. वृकः-वृक, 
४८२. पावनः पावन, 
४८३. वह्निमित्रः = वह्निमित्र, 
४८४. क्षुधिः = क्षुधि, हर्षक:- हर्षक, 
४८६. अनिलः- अनिल, 
४८७. अमित्रजित् = अमित्रजित् 
४८८. सुभद्रः सुभद्र, 
४८९. जय जय, 
४९०. सत्यक:- सत्यक, 
४९१. वामः- वाम, 
४९२. आयु: →आयु, यदुः यदु, 
४९३. कोटिशः पुत्रपौत्रैः प्रसिद्धः= इस प्रकार करोड़ों पुत्र-पौत्रोंसे प्रसिद्ध ॥ ६८ ॥ 

४९४. हली दण्डधृक्-ईषादण्डधारी हलधर बलराम, 
४९५ रुक्महा-रुक्मिीका वध करनेवाले, 
४९६. अनिरुद्धः किसीके द्वारा रोके न जा सकने वाले, 
४९७. राजभिर्हास्यगः-अनिरुद्धके विवाहमें द्यूत-क्रीड़ाके समय राजाओंने जिनकी हँसी उड़ायी, वे, 
४९८. द्यूतकर्ता = विनोदके लिये द्यूत-क्रीड़ामें भाग लेनेवाले बलरामजी 
४९९. मधुः मधुवंशमें अवतीर्ण, 
५०० ब्रह्मसूः = ब्रह्माजीके अवतार अनिरुद्ध, 


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