10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 61 || भगवान के श्यामवर्ण होने का रहस्य; कलियुग की पापमयी प्रवृत्ति; उससे बचने के लिये श्रीकृष्ण की समाराधना तथा एकादशी-व्रत का माहात्म्य
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 61 || भगवान के श्यामवर्ण होने का रहस्य; कलियुग की पापमयी प्रवृत्ति; उससे बचने के लिये श्रीकृष्ण की समाराधना तथा एकादशी-व्रत का माहात्म्य
वज्रनाभ ने पूछा- ब्रह्मन ! नारायण स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण तो प्रकृति से परे हैं, फिर उनका रूप श्याम कैसे हुआ ? यह मुझे विस्तारपूर्वक बताइये। विप्रवर ! आप जैसे मुनि श्रीकृष्णदेव श्रीहरि के चरित्र को जैसा मानते हैं, वैसा हम-जैसे लोग कर्म से मोहित होने के कारण नहीं जान पाते।
सूतजी कहते हैं- मुने ! वज्रनाभ का यह वचन सुनकर उनसे प्रशंसित हो, उन तत्वज्ञ तथा कृपालु मुनि ने तत्त्वज्ञान कराने के लिये इस प्रकार कहा।
गर्गजी बोले- राजन् ! ‘श्रृगार रस’ का रूप भरतादि मुनीश्वरों ने ‘श्याम’ बताया है। उसके देवता श्रीकृष्ण हैं। लावण्य की राशि तथा उज्ज्वल होने के कारण श्रीहरि का सुन्दर रूप उस तरह श्याम है, जैसे मेघों की घटा का रूप दूर से श्याम दिखाई देता है, जैसे नदी का जल कुण्ड विशेष में श्याम दृष्टिगोचर होता है तथा जैसे महान आकाश का रूप श्यामल प्रतीत होता है; परन्तु जल या आकाश उज्ज्वल ही है, कृष्णवर्ण कदापि नहीं है। इसी प्रकार उज्ज्वल लावण्यसिन्धु श्रीकृष्ण श्याम सुन्दर दिखायी देते हैं। जैसे उत्कृष्ट श्वेत वस्त्र में दूसरे को भावनानुसार श्याम आभा दृष्टिगोचर होती है, उसी प्रकार करोड़ों कामदेवों की लीला का आधार होने के कारण संतजन श्रीहरि का श्यामरूप बताते हैं ।
वज्रनाभ ने पू्छा- मुनिश्रेष्ठ ! आपके इस वचन से मेरे मन का संदेह दूर हो गया। ब्रह्मन ! अब आगे चलकर भूतल पर घोर कलियुग आने वाला है। मुने ! उसमें मनुष्य कैसे होगे, यह बताइये ! आप भविष्य को भी जानते है; अत: मैं आपसे पूछता हूँ और आपको प्रणाम करता हूँ ।
श्रीगर्गजी ने कहा- राजन् ! कलियुग के दस हजार वर्ष बीतने तक भगवान जगन्नाथ भूतल पर स्थित रहते हैं (उसके बाद सर्वत्र विद्यमान होते हुए भी अविद्यमान की भाँति उसके ऊपर नियंत्रण करना छोड़ देते हैं)। उसके आधे समय (पांच हजार वर्ष) तक गंगाजी के जल में उसकी अधिष्ठात्री देवी गंगा का निवास रहेगा। तदनन्तर कलि से मोहित होकर सब लोग पापी हो जायँगे; अत: नरकों में गिरेंगे। सब की आयु बहुत कम हो जायगी। ब्राह्मण ब्राह्मण से मूल्य लेकर उसे अपनी कन्या देंगे। क्षत्रिय लोग अत्यन्त लोलुप होकर अपनी पुत्री को मार डालेंगे। वैश्य ब्राह्मण के धन का हरण करने में तत्पर हो झूठा व्यापार करेंगे। शूद्रलोग म्लेक्ष्छों के संग से ब्राह्मणों को दूषित करेंगे। ब्राह्मण शास्त्र ज्ञान से शून्य, क्षत्रिय राज्याधिकार से वंचित, वैश्य निर्धन तथा शूद्र अपने स्वामी को दु:ख देने वाले होंगे। सब लोग धर्म-कर्म से दूर रहकर दिन में मैथुन करेंगे।
स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी और पुरुष योनिलम्पट होंगे। देवताओं, पितरों तथा ऋत्विजों का, भगवान विष्णु का, वैष्णवजनों का, तुलसी का तथा गौओं का पूजन एवं सेवा-सत्कार कलिमोहित मनुष्य प्राय: नहीं करेंगे। लोग वेश्याओं में, परस्त्रियों में तथा पराये धन में आसक्त होंगे। प्राय: सब मनुष्य शूद्र के समान एक वर्ण हो जायंगे। निरन्तर ओले और पत्थरों की वर्षा से पृथ्वी सस्यहीन होगी। खेती-बारी चौपट हो जायगी। वृक्षों में फल नहीं लगेंगे। नदियों का पानी सूख जायगा। प्रजा राजा को मारेगी और राजा प्रजा को।
राजा वज्रनाभन ने पूछा- विप्रेन्द्र ! आप भूत और भविष्य के ज्ञाताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। अत: मुझे यह बताइये कि ‘कलियुग में जीवों की मुक्ति किस उपाय से होगी ?
गर्गजी ने कहा- राजा युधिष्ठिर, विक्रमादित्य, शालिवाहन, विजयाभिनन्दन, राजा नागार्जुन तथा भगवान कल्कि ये संवत्सर के प्रवर्तक होंगे। ये ही भूपाल पद पर प्रतिष्ठित हो कलि में धर्म की स्थापना करेंगे। राजा युधिष्ठिर तो हो चुके। शेष राजा भविष्य काल में यथा समय होंगे। वे चक्रवर्ती होकर अधर्म का नाश करेंगे। वामन, ब्रह्मा, शेषनाग और सनकादि- ये भगवान विष्णु के आदेश से धर्म की स्थापना एवं रक्षा के लिये कलियुग में ब्राह्मण होंगे। वामन के अंश से विष्णुस्वामी और बह्मा जी के अंश से माध्वाचार्य होंगे। शेषनाग का अंश निम्बार्काचार्य के रूप में। ये कलियुग में सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य होंगे। ये चारों विक्रम संवत्सर के प्रारम्भिक काल में ही होंगे और इस भूतल को अपने सम्पर्क से पावन बनायेंगे। सम्प्रदाय विहीन मंत्र निष्फल माने गये हैं; अत: सभी मनुष्यों को सम्प्रदाय के मार्ग से ही चलना चाहिये। इन सम्प्रदायों में पापों का नाश करने वाली श्रीकृष्ण-कथा होती है। ब्राह्मणों में श्रेष्ठ नारायण परायण वैष्णवजन इन कथाओं का प्रवचन एवं प्रसार करते हैं। सत्ययुग में किसी के किये हुए पाप से सारा देश लिप्त होता है। त्रेता में ग्राम, द्वापर में कुल और कलियुग में केवल कर्ता ही उस पाप से लिप्त होता है सत्य युग में ध्यान, त्रेता में यज्ञों द्वारा यजन और द्वापर में भगवान की अर्चना करके मनुष्य जिस पुण्य का भागी होता है, उसी को कलियुग में केवल ‘केशव’ का नाम-कीर्तन करके मनुष्य पा लेता है। सत्ययुग में जो सत्यकर्म दस वर्षों में सफल होता है, वह त्रेता में एक ही वर्ष में, द्वापर में एक ही मास में तथा कलियुग में केवल एक दिन-रात में सफल हो जाता है। सब धर्मों से रहित घोर कलियुग प्राप्त होने पर जो मानव भगवान वासुदेव की आराधना में तत्पर रहते हैं, वे निस्संदेह कृतार्थ हो जाते हैं।
नरेश्वर ! मनुष्यों में वे लोग निश्चय ही सौभाग्यशाली और कृतार्थ हैं, जो कलियुग में श्रीहरि के नामों का स्मरण करते और कराते हैं। ‘कृष्’ शब्द ‘सर्व’ का वाचक है और ‘ण’ कार ‘आत्मा’ का। इसलिये जो सर्वात्मा परब्रह्मा है, वही ‘कृष्ण’ कहा गया है। परब्रह्म स्वरूप, वेदों का सारतत्व तथा परात्पर वस्तु ‘कृष्ण’- ये दो अक्षर ही सम्यक् रूप से जपने योग्य हैं। इससे बढ़कर दूसरा कोई तत्व नहीं है, नहीं है। कामसक्त मनुष्य तभी तक गर्भवास की यन्त्रणा झेलता है, तभी तक यमयातना भोगता है तथा गृहस्थ मनुष्य तभी तक भोगार्थी रहता है, जब तक वह श्रीकृष्ण की सेवा नहीं करता है।
विषय, भोगोपकरण और बन्धु-बान्धव (ये सभी इस भूतल पर विनाशशील हैं, यह बात सत्य है,) तथापि यदि इन्हें स्वयं छोड़ दिया जाये तो ये सुखदायक होते हैं; परन्तु यदि दूसरों ने इन्हें छुड़वा दिया तो इनका वियोग दु:ख देने वाला होता है। यदि दैववश महापुरुषों की निन्दा सुन लेने पर विज्ञ पुरुष भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण कर लेता है तो वह सब पापों से मुक्त हो जाता है; अन्यथा रौरव नरक में पड़ता है। देवता काष्ठ, पत्थर या सोने की प्रतिमा में नहीं हुआ करता है; जहाँ भी मनुष्य का भगवद्भाव हो जाय, वहीं श्रीहरि विद्यमान हैं। इसलिये मनुष्य भाव ही करे या करावे। जिसने एक बार भी ‘कृष्ण’- इन दो अक्षरों का उच्चारण कर लिया, उसने मोक्ष तक पहुँचने के लिये कमर कस ली। रोगी होना, सत्पुरुषों से वैर बांधना, दूसरों को ताप देना, ब्राह्मणों और वेद की निन्दा करना, अत्यन्त क्रोधी होना और कटुवचन बोलना- ये सब नरकगामी मनुष्य के लक्षण हैं। जो इस जीव-जगत् में स्वर्गलोक से लौटकर आये हैं, उनमें ये चार चिन्ह सदा रहते हैं-
1- दान का प्रसंग,
2- मधुर वचन,
3- देव पूजा और
4- ब्राह्मणों का सत्कार’[1]
राजा ने पूछा- ब्रह्मन ! व्रतों में कौन-सा व्रत श्रेष्ठ है, उत्तम तीर्थों में कौन महान है और पूजनीय देवताओं में कौन मुख्य है ? यह मुझे बताइये।
गर्गजी ने कहा- यदुनन्दन ! व्रतो में ’एकादशी’ सबसे श्रेष्ठ है। तीर्थों में भागीरथी ‘गंगा’, दैवभक्तों में ‘वैष्णव’, देवताओं मे ‘भगवान विष्णु‘ और पूजनीयों में ’श्रीगुरु’ सबसे महान है। जो इस बात को नहीं मानते हैं, वे ‘कुम्भीपाक’ नरक में गिरते हैं।
राजा बोले- मुने ! गुरुदेव ! एकादशी का तथा अन्य भागीरथी आदि का माहात्म्य कृपा करके मुझसे कहिये; आपको नमस्कार है।
गर्गजी ने कहा- यदुनन्दन ! मैं सब कुछ बताता हूँ, सुनो। एकादशी के दिन अन्न तथा फल कुछ भी नहीं खाना चाहिये। नृपश्रेष्ठ ! जो शास्त्रोक्त विधि से प्रसन्नतापूर्वक एकादशी-व्रत का पालन करता है, उसके लिये वहाँ सदा फलदायिनी होता है।
वज्रनाभ बोले- महर्षि ! जो मनुष्य एकादशी को फलाहार करते हैं, उनकी क्या गति होती है ? यह हमें विस्तारपूर्वक बताइये।
गर्गमुनि ने कहा- उपवास करने से एकादशी-व्रत का शास्त्रोक्त फल पूरा-पूरा मिलता है, फलाहार करने से आधा मिलता है और पानी पीकर रहने से सम्पूर्ण की अपेक्षा कुछ-कुछ कम फल प्राप्त होता है। नृपेश्वर ! गेहूँ आदि सब अन्नों का त्याग कर एकादशी के दिन मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक फलाहार करे। राजन ! जो नराधम एकादशी को अन्न खाता है, वह इस लोक में चाण्डाल के समान है और मरने पर उसे दुर्गति प्राप्त होती है। राजेन्द्र ! दही, दूध, मिठाई, कूट, ककड़ी, बथुआ, कमलगट्टा, आम, सीताफल, गंगाफल, नीबू का पत्ता, अनार, सिंघाड़ा, नारंगी, सेंधा नमक, अमड़ा, अदरक, तूल, बेर, जामुन, आंवला, परवल, त्रिकुश, रतालु, सकरकंद, गन्ना और दाख आदि तथा अन्यान्य पवित्र फल एकादशी को एक बार खाने चाहिये।
दिन का तीसरा प्रहर व्यतीत होने पर एक सेर फल का आधा भाग तो ब्राह्मण को दान कर देना चाहिये और आधा अपने लिये भोजन में काम में लेना चाहिये। एकादशी को एक बार फल खाय और दो बार पानी पीये। भगवान विष्णु का पूजन करके रात में जागरण करे। जो मनुष्य एकादशी को दो या तीन बार फलाहार करता है, उसको कोई फल नहीं मिलता। पंद्रह दिनों तक अन्न खाने से जो पाप लगता है, वह सब-का-सब एकादशी के उपवास से नष्ट हो जाता है। भोजन का ब्राह्मण को दान करके स्वयं उपवास करे और एकादशी का माहात्म्य सुने। ऐसा करके मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। एकादशी के व्रत से धनार्थी धन पाता है, पुत्रार्थी को पुत्र प्राप्त होता है और मोक्षार्थी मोक्ष को पा लेता है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अन्तर्गत अश्वमेध खण्ड में ‘एकादशी का माहात्म्य’ नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ।
1. कृते तु लिप्यते देशो त्रेतायां ग्राम एव च। द्वापरे च कुलं प्रोक्तं कलौ कर्त्तैव लिप्यते ।। ध्यायन् कृते यजन् यज्ञेस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ।। कृते यद्दशभिर्वषैस्त्रेतायां हायनेन च। द्वापरे चैकमासेन ह्यहोरात्रेण तत्कलौ ।। घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वधर्मविर्जिते। वासुदेवपरा मर्त्यास्ते कृतार्था न संशय: ।। ते सभाग्या मनुष्येतषु कृतार्था नृप निश्चितम्। स्मरन्ति स्मारयन्ते ये हरेर्नामानि वै कलौ ।। कृषिश्च सर्ववचनो णकारश्चात्मवाचक:। सर्वात्मा च परं ब्रह्म तेन कृष्ण: प्रकीर्तित: ।। संजप्य ब्रह्म परमं वेदसारं परात्परम्। परं नास्तीति नास्तीति ‘कृष्ण’ इत्यक्षरद्वयम् ।। तावद्गर्भे वसेत् कामी तावती यमयातना। तावद्गृही च भोगार्थी यावत्कृष्णं न सेवते ।। नश्वरो विषय: सत्यं भोगश्च बन्धवो भुवि। स्वयं त्यक्ता: सुखायैव दु:खाय त्याजिता: परै ।। श्रुत्वा दैवान्महन्निन्दां श्रीकृष्णस्मरणाद् बुध:। मुच्यते सर्वपापेभ्यो नान्यथा रौरवं व्रजते् ।। न काष्ठे विद्यते देवो न शिलायां न काञ्चने। यत्र भावस्तत्र हरिस्तस्माद्भावं हि कारयेत् ।। सकृदुच्चरितं चेन ‘कृष्ण’ इत्यक्षरद्वयम। बद्ध: परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।। सरोगता साधुजनेषु वैरं परोपतापो द्विजवेदनिन्दा। अत्यन्तकोप: कटुका च वाणी नरस्य चिह्नं नरके गतस्य ।। स्वर्गागतानमिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि सदा वसन्ति। दानप्रसंगो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणपूजनं च ।।
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