11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 03 || राजा प्रतिबाहु के प्रति महर्षि शाण्‍डिल्‍य द्वारा गर्गसंहिता के माहात्‍म्‍य और श्रवण-विधि का वर्णन

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 03 || राजा प्रतिबाहु के प्रति महर्षि शाण्‍डिल्‍य द्वारा गर्गसंहिता के माहात्‍म्‍य और श्रवण-विधि का वर्णन

शाण्‍डिल्‍य ने कहा- राजन् ! पहले भी तो तुम बहुत-से उपाय कर चुके हो, परंतु उनके परिणामस्‍वरूप एक भी कुलदीपक पुत्र उत्‍पन्न नहीं हुआ। इसलिये अब तुम पत्नी के साथ शुद्ध-हृदय होकर विधिपूर्वक ‘गर्गसंहिता’ का श्रवण करो। राजन् ! यह संहिता धन, पुत्र और मुक्‍ति प्रदान करने वाली है। यद्यपि यह एक छोटा सा उपाय है, तथापि कलियुग में जो मनुष्‍य इस संहिता का श्रवण करते हैं, उन्‍हें भगवान विष्‍णु पुत्र, सुख आदि सब प्रकार की सुख-सम्‍पत्‍ति दे देते हैं। नरेश ! गर्गमुनि की इस संहिता के नवाह पारायणरूप यज्ञ से मनुष्‍य सद्य:पावन हो जाते हैं। उन्‍हें इस लोक में परम सुख की प्राप्‍ति होती है तथा मृत्‍यु के पश्‍चात् वे गोलोकपुरी में चले जाते हैं। इस कथा को सुनने से रोगग्रस्‍त मनुष्‍य रोग-समूहों से, भयभीत भय से और बन्‍धनग्रस्‍त बन्‍धन से मुक्‍त हो जाता है। निर्धन को धन-धान्‍य की प्राप्‍ति हो जाती है तथा मूर्ख शीघ्र ही पण्‍डित हो जाता है। इस कथा के श्रवण से ब्राह्मण विद्वान, क्षत्रिय विजयी, वैश्‍य खजाने का स्‍वामी तथा शूद्र पापरहित हो जाता है।

यद्यपि सह संहिता स्‍त्री–पुरुषों के लिये अत्‍यन्‍त दुर्लभ है, तथापि इसे सुनकर मनुष्‍य सफल मनोरथ हो जाता है। जो निष्‍कारण अर्थात् कामना रहित होकर भक्‍तिपूर्वक मुनिवर गर्ग द्वारा रचित इस सम्‍पूर्ण संहिता को सुनता है, वह सम्‍पूर्ण विघ्‍नों पर विजय पाकर देवताओं को भी पराजित करके श्रेष्‍ठ गोलोकधाम को चला जाता है। राजन् ! गर्गसंहिता की प्रबन्‍ध-कल्‍पना परम दुर्लभ है। यह भूतल पर सहस्‍त्रों जन्‍मों के पुण्‍य से उपलब्‍ध होती है। श्रीगर्गसंहिता के श्रवण के दिनों का कोई नियम नहीं है। इसे सर्वदा सुनने का विधान है। इसका श्रवण कलियुग में भुक्‍ति और मुक्‍ति प्रदान करने वाला है। समय क्षणभंगुर है; पता नहीं कल क्‍या जाय; इसलिये संहिता-श्रवण के लिये नौ दिन का नियम बतलाया गया है।

भूपाल ! श्रोता को चाहिये कि वह ज्ञानपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एक बार एक अन्‍न का या हविष्‍यान्‍न का भोजन करे अथवा फलाहार करे। उसे विधान के अनुसार मिष्‍टान्‍न, गेहूँ अथवाजौ की पूड़ी, सेंधा नमक, कंद, दही और दूध का भोजन करना चाहिये। नृपश्रेष्‍ठ ! विष्‍णु भगवान के अर्पित किये हुए भोजन को ही प्रसाद रूप में खाना चाहिये। बिना भगवान का भोग लगाये आहार नहीं ग्रहण करना चाहिये। श्रद्धापूर्वक कथा सुननी चाहिये; क्‍योंकि यह कथा-श्रवण सम्‍पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। बुद्धिमान श्रोता को चाहिये कि वह पृथ्‍वी पर शयन करे और क्रोध तथा लाभ को छोड़ दे। इस प्रकार गुरु के श्रीमुख से कथा सुनकर वह सम्‍पूर्ण मनोवांछित फल प्राप्‍त कर लेता है। जो गुरु-भक्‍ति से रहित, नास्‍तिक, पापी, विष्‍णुभक्‍ति से रहित, श्रद्धाशून्‍य तथा दुष्‍ट हैं, उन्‍हें कथा का फल नहीं मिलता।

विद्वान श्रोता को चाहिये कि वह अपने परिचित ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्‍य और शूद्र-सभी को बुलाकर शुभ मुहूर्त में अपने घर पर कथा को आरम्‍भ कराये। भक्‍ति पूर्वक केले के खंभों से मण्‍डप का निर्माण करे। सबसे पहले पंचपल्‍लव सहित जल से भरा हुआ कलश स्‍थापित करे। फिर पहले-पहल गणेश की पूजा करके तत्‍पश्‍चात नवग्रहों की पूजा करे। तदनन्‍तर पुस्‍तक की पूजा करके विधिपूर्वक वक्‍ता की पूजा करे और उन्‍हें सुवर्ण की दक्षिणा दे। असमर्थ होने पर चांदी की भी दक्षिणा दी जा सकती जा सकती है। पुन: कलश पर श्रीफल रखकर मिष्‍टान्‍न निवेदन करना चाहिये। तत्‍पश्‍चात भक्‍तिपूर्वक तुलसी दलों द्वारा भली-भाँति पूजन करके आरती उतारनी चाहिये। राजन् ! कथा समाप्‍ति के दिन श्रोता की प्रदक्षिणा करनी चाहिये। जो परस्‍त्रीगामी, धूर्त, वकवादी, शिव की निन्‍दा करने वाला, विष्‍णु-भक्‍ति से रहित और क्रोधी हो, उसे ‘वक्‍ता’ नहीं बनाना चाहिये। जो वाद-विवाद करने वाला, निन्‍दक, मूर्ख, कथा में विघ्‍न डालने वालाऔर सबको दु:ख देने वाला हो, वह ‘श्रोता’निन्‍दनीयकहा गया है।जो गुरु-सेवा परायण, विष्‍णु भक्‍ति और कथा के अर्थ को समझने वाला है तथा कथा सुनने में जिसका मन लगता है, वह श्रोता श्रेष्‍ठ कहा जाता है। जो शुद्ध, आचार्य-कुल में उत्‍पन्न, श्रीकृष्‍ण का भक्‍त, बहुत-से शास्‍त्रों का जानकार, सदा सम्‍पूर्ण मनुष्‍यों पर दया करने वाला और शंकाओं का उचित समाधान करने वाला हो, वह उत्तम वक्ता कहा गया है। द्वादशाक्षर मंत्र के जप द्वारा कथा के विघ्‍नों का निवारण करने के लिये यथा शक्‍ति अन्‍यान्य ब्राह्मणों का भी वरण कराना चाहिये।

विद्वान वक्‍ता को तीन प्रहर (9 घंटे) तक उच्‍च स्‍वर से कथा बाँचनी चाहिये। कथा के बीच में दो बार विश्राम लेना उचित है। उस समय लघु शंका आदि से निवृत्‍त होकर जल से हाथ-पैर धोकर पवित्र हो ले। साथ ही कुल्‍ला करके मुख-शुद्धि भी कर लेनी चाहिये। राजन् ! नवें दिन की पूजा-विधि विज्ञानखण्‍ड में बतलायी गयी है। उस दिन उत्‍तम बुद्धिसम्‍पन्न श्रोता पुष्‍प, नैवेद्य और चन्‍दन से पुस्‍तक की पूजा करके पुन: सोना, चांदी, वाहन, दक्षिणा, वस्‍त्र, आभूषण और गन्‍ध आदि से वक्‍ता का पूजन करे। नरेश ! तत्‍पश्‍चात यथा शक्‍ति नौ सहस्‍त्र या नौ सौ या निन्‍यानबे अथवा नौ ब्राह्मणों को निमंत्रित करके खीर का भोजन कराये। तब कथा के फल की प्राप्‍ति होती है। कथा-विश्राम के समय विष्‍णु–भक्‍ति सम्‍पन्न स्‍त्री–पुरुषों के साथ भगवान्‍नाम-कीर्तन भी करना चाहिये। उस समय झांझ, शंख, मृंदग आदि बाजों के साथ-साथ बीच-बीच में जयकारे के शब्‍द भी बोलने चाहिये। जो श्रोता श्रीगर्गसंहिता की पुस्‍तक को सोने के सिंहासन पर स्‍थापित करके उसे वक्‍ता को दान कर देता है, वह मरने पर श्रीहरि को प्राप्‍त करता है। राजन् ! इस प्रकार मेंने तुम्‍हें गर्गसंहिता का माहात्‍म्‍य बतला दिया, अब और क्‍या सुनना चाहते हो ? अरे, इस संहिता के श्रवण से ही भुक्‍ति और मुक्‍ति की प्राप्‍ति देखी जाती है।

इस प्रकार श्रीसम्‍मोहन-तंत्र में पार्वती-शंकर-सवाद में ‘श्रीगर्गसंहिता के माहात्‍म्‍य तथा श्रवणविधि का वर्णन’ नामक तीसरा अध्‍याय पूरा हुआ।

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य