11. गर्ग संहिता-माहात्म्य || अध्याय 02 || नारद जी की प्रेरणा से गर्ग द्वारा संहिता की रचना; संतान के लिए दुखी राजा व्यक्ति बहू के पास महर्षि शांडिल्य का आगमन
11. गर्ग संहिता-माहात्म्य || अध्याय 02 || नारद जी की प्रेरणा से गर्ग द्वारा संहिता की रचना; संतान के लिए दुखी राजा व्यक्ति बहू के पास महर्षि शांडिल्य का आगमन
महादेवजी ने कहा- देवर्षि नारद का कथन सुनकर महामुनि गर्गाचार्य विनय से झुककर हंसते हुए यों कहने लगे ।
गर्गजी बोले- ब्रह्मन ! आपकी कही हुई बात यद्यपि सब तरह से अत्यन्त कठिन है- यह स्पष्ट है, तथापि यदि आप कृपा करेगें तो मैं उसका पालन करूंगा।
सर्वमंगले ! यों कहे जाने पर भगवान नारद हर्षातिरेक से अपनी वीणा बजाते और गाते हुए ब्रह्मलोक में चले गये। तदनन्तर गर्गाचल पर जाकर कवि श्रेष्ठ गर्ग ने इस महान अद्भुत शास्त्र की रचना की। इसमें देवर्षि नारद और राजा बहुलाश्व के संवाद का निरूपण हुआ है। यह श्रीकृष्ण के विभिन्न विचित्र चरित्रों से परिपूर्ण तथा सुधा-सदृश स्वादिष्ट बारह हजार श्लोकों से सुशोभित है। गर्गजी ने श्रीकृष्ण के जिस महान चरित्र को गुरु के मुख से सुना था, अथवा स्वयं अपनी आंखों देखा था, वह सारा-का-सारा चरित्र इस संहिता में सजा दिया है। वह कथा ‘श्रीगर्गसंहिता’ नाम से प्रचलित हुई।
यह कृष्णभक्ति प्रदान करने वाली है। इसके श्रवण मात्र से सभी कार्य सिद्ध हो जाते है। इस विषय में एक प्राचीन इतिहास का वर्णन किया जाता है, जिसके सुनते ही सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। वज्र के पुत्र राजा प्रतिबाहु हुए, जो प्रजा-पालन में तत्पर रहते थे। उस राजा की प्यारी पत्नि का नाम मालिनी देवि था। राजा प्रतिबाहु पत्नि के साथकृष्णपुरी मथुरा में रहते थे। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिये विधानपूर्वक बहुत-सा यत्न किया। राजा ने सुपात्र ब्राह्मणों को बछड़े-सहित बहुत-सी गायों का दान दिया तथा प्रयन्तपूर्वक भरपूर दक्षिणाओं से युक्त अनेकों यज्ञों का अनुष्ठान किया। भोजन और धन द्वार गुरुओं, ब्राह्मणों और देवताओं का पूजन किया, तथापि पुत्र की उत्पत्ति नहीं हुई। तब राजा चिन्ता और शोक में डूबे रहते थे। इनके पितर (तर्पण में) दिये हुए जल को कुछ गरम-सा पान करते थे। ‘इस राजा के पश्चात जो हम लोगों को तर्पण द्वारातृप्त करेगा- ऐसा कोई दिखाई नहीं पड़ रहा है। इस राजा के भाई-बन्धु, मित्र, अमात्य, सुहृद तथा हाथी, घोड़े और पैदल-सैनिक-किसी को भी इस बात की कोई चिन्ता नहीं है।’ इस बात को याद करके राजा के पितृगण अत्यन्तदु:खी हो जाते थे। इधर राजा प्रतिबाहु के मन में निरन्तर निराशा छायीरहती थी।
(वे सोचते रहते थे कि) ‘पुत्रहीन मनुष्य का जन्म निष्फल है। जिसके पुत्र नहीं है, उसका घर सूना-सा लगता है और मन सदा दु:खाभिभूत रहता है। पुत्र के बिना मनुष्य देवता, मनुष्य और पितरों के ऋण से उऋण नहीं हो सकता। इसलिये बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि वह सभी प्रकार के उपायों का आश्रय लेकर पुत्र उत्पन्न करे। उसी की भूतल पर कीर्ति होती है और परलोक में उसे शुभगति प्राप्त होती है। जिन पुण्यशाली पुरुषों के घर में पुत्र का जन्म होता है, उनके भवन में आयु, आरोग्य और सम्पत्ति सदा बनी रहती है।’ राजा अपने मन में यों लगातार सोचा करते थे, जिससे उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी।
अपने सिर के बालों श्वेत हुआ देखकर वे रात-दिन शोक में निमग्न रहते थे। एक समय मुनीश्वर शाण्डिल्य स्वेच्छापूर्वक विचरते हुए प्रतिबाहु से मिलने के लिये उनकी राजधानी मधुपुरी (मथुरा) में आये। उन्हें देखकर राजा सहसा अपने सिंहासन से उठ पड़े और उन्हें आसन आदि देकर सम्मानित किया। पुन: मधुपर्क आदि निवेदन करके हर्षपूर्वक उनका पूजन किया। राजा को उदासीन देखकर महर्षि को परम विस्मय हुआ। ततपश्चात मुनीश्वर ने स्वस्तिवाचन पूर्वक राजा का अभिनन्दन करके उनसे राज्य के सातों अंगों के विषय में कुशल पूछी। तब नृपश्रेष्ठ प्रतिबाहु अपनी कुशल निवेदन करने के लिये बोले।
राजा ने कहा- ब्रह्मन ! पूर्वजन्मार्जित दोष के कारण इस समय मुझे जो दु:ख प्राप्त है, अपने उस कष्ट के विषय में मैं क्या कहूँ ? भला, आप-जैसे ऋषियों के लिये क्या अज्ञात है ? मुझे अपने राष्ट्र तथा नगर में कुछ भी सुख दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किस प्रकार मुझे पुत्र की प्राप्ति हो। ‘राजा के बाद जो हमारी रक्षा करे- ऐसा हमलोग किसी को नहीं देख रहे हैं ।’ इस बात को स्मरण करके मेरी सारी प्रजा दु:खी है। ब्रह्मन ! आप तो साक्षात दिव्यदर्शी है; अत: मुझे ऐसा उपाय बतलाइये, जिससे मुझे वंश प्रवर्तकदीर्घायु पुत्र की प्राप्ति हो जाय।
महादेवजी बोले- देवि ! उस दु:खी राजा के इस वचन को सुनकर मुनिवर्य शाण्डिल्य राजा के दु:ख को शान्त करते हुए-से बोले।
इस प्रकार श्रीसम्मोहन-तंत्र में पार्वती-शंकर-संवाद में ‘गर्गसंहिता का माहात्म्य’ विषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ।
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