पशु पति नाथ मंदिर मे नंदी के दर्शन नही करना चाहिए,क्यों?

पशु पति नाथ 
नेपाल के  पशु पति नाथ मंदिर की अनोखी

➖ महिमा➖

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अगर आप कभी नेपाल घुमने जाते हैं तो आपको वहां जाकर इस बात का बिल्कुल भी एहसास नहीं होगा कि आप एक अलग देश में हैं। कुछ भारत जैसी संस्कृति और संस्कारों को देखकर आप आश्चर्यचकित जरुर हो जायेंगे। आप अगर शिव भगवान के भक्त हैं तो आपको एक बार नेपाल स्थित भगवान शिव का पशुपतिनाथ मंदिर जरूर जाना चाहिए।
नेपाल में भगवान शिव का पशुपतिनाथ मंदिर विश्वभर में विख्यात है। इसका असाधारण महत्त्व भारत के अमरनाथ व केदारनाथ से किसी भी प्रकार कम नहीं है। पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है।
यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है। यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है।
यह मंदिर हिन्दू धर्म के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है। इस अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ के दर्शन के लिए भारत के ही नहीं, अपितु विदेशों के भी असंख्य यात्री और पर्यटक काठमांडू पहुंचते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव यहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहाँ प्रकट हुए थे।
पशुपतिनाथ लिंग विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग में पांचवां मुख है। प्रत्येक मुखाकृति के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल है। प्रत्येक मुख अलग-अलग गुण प्रकट करता है। पहला मुख 'अघोर' मुख है, जो दक्षिण की ओर है। पूर्व मुख को 'तत्पुरुष' कहते हैं। उत्तर मुख 'अर्धनारीश्वर' रूप है। पश्चिमी मुख को 'सद्योजात' कहा जाता है। ऊपरी भाग 'ईशान' मुख के नाम से पुकारा जाता है। यह निराकार मुख है। यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख माना जाता है।
इतिहास को देखने पर ज्ञात होता है कि पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान की सेवा करने के लिए 1747 से ही नेपाल के राजाओं ने भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित किया है। इसके पीछे यह तथ्य बताये जाते हैं कि भारतीय ब्राह्माण हिन्दू धर्मशास्त्रों और रीतियों में ज्यादा पारंगत होते हैं। बाद में 'माल्ला राजवंश' के एक राजा ने दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को ‘पशुपतिनाथ मंदिर’ का प्रधान पुरोहित नियुक्त किया। दक्षिण भारतीय भट्ट ब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त होते रहे हैं।
मंदिर के निर्माण का कोई प्रमाणित इतिहास तो नहीं है किन्तु कुछ जगह पर यह जरुर लिखा गया है कि मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में कराया था।
कुछ इतिहासकार पाशुपत सम्प्रदाय को इस मंदिर की स्थापना से जुड़ा मानते हैं। पशुपति काठमांडू घाटी के प्राचीन शासकों के अधिष्ठाता देवता रहे हैं। 605 ईस्वी में अमशुवर्मन ने भगवान के चरण छूकर अपने को अनुग्रहीत माना था। बाद में मध्य युग तक मंदिर की कई नकलों का निर्माण कर लिया गया। ऐसे मंदिरों में भक्तपुर (1480), ललितपुर (1566)  शामिल हैं। मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ है। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया।
मंदिर की आध्यात्मिक शक्ति की चर्चाआसपास में काफी प्रचलित है। भारत समेत कई देशों से लोग यहाँ आध्यात्मिक शांति की तलाश में आते हैं। अगर आप भी भगवान शिव के दर्शनों के अभिलाषी हैं तो यहाँ साफ़ और छल रहित दिल से आकर, आप शिव के दर्शन कर सकते हैं।
मंदिर की महिमा के बारे में आसपास के लोगों से आप काफी कहानियां भी सुन सकते हैं। मंदिर में अगर कोई घंटा-आधा घंटा ध्यान करता है तो वह जीव कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त भी हो जाता है।
विशेष,,,,
भारत के उत्तराखण्ड राज्य में स्थित प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर की किंवदंती के अनुसार पाण्डवों को स्वर्गप्रयाण के समय भैंसे के स्वरूप में शिव के दर्शन हुए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन भीम ने उनकी पूँछ पकड़ ली थी। ऐसे में उस स्थान पर स्थापित उनका स्वरूप केदारनाथ कहलाया, तथा जहाँ पर धरती से बाहर उनका मुख प्रकट हुआ, वह पशुपतिनाथ कहलाया.....
जय पशु पति नाथ जी 🚩🙏🙏
हर हर महादेव 🙏🙏
हर_हर_महादेव ।
जय_श्री_राम
 ॐ_नमः_शिवाय
                        

पशु पति नाथ मंदिर मे नंदी के दर्शन नही करना चाहिए,क्यों?
भारत सहित पूरी दुनिया में भोलेनाथ के हजारों मंदिर और तीर्थ स्थान मौजूद है। जो अपने चमत्कारों और धार्मिकता के कारण विश्व प्रसिद्ध है।
  भोलेनाथ के अनेको नाम है। उन्ही में से एक नाम है पशुपति मंदिर।
यह मंदिर शिव के 12 ज्योतिर्लिगों में एक माना जाता है। इस मंदिर के बारें में कहा जाता है कि आज भी यहां पर भगवान शिव विराजमान है।

पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से 3 किमी उत्तर-पश्चिम देव पाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है।
यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है। (यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल) भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है।
भगवान् शिव का यह मंदिर हिन्दू धर्म के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है।
नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है।  इस मंदिर से जुड़े कुछ रहस्यों के बारें में। जिन्हें जानकर आप आश्चर्य चकित हो जाएगे।

{१}-  भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित इस मंदिर में दर्शन के लिए हर साल हजारों संख्या में भक्त यहां पर आते है।
इस मंदिर में भारतीय पुजारियों की सबसे अधिक संख्या है। सदियों से यह परंपरा चलती चली आ रही है कि मंदिर में चार पुजारी और एक मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं।
{२} - पशुपति मंदिर को 12 ज्योतिर्लिगों में से एक केदारनाथ का आधा भाग माना जाता है।
जिसके कारण इस मंदिर का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। साथ ही शक्ति और बढ़ जाती है।
{३}-  इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग के पांचो मुखों के गुण अलग-अलग हैं।
जो मुख दक्षिण की और है उसे अघोर मुख कहा जाता है, पश्चिम की ओर मुख को सद्योजात, पूर्व और उत्तर की ओर मुख को तत्वपुरुष और अर्धनारीश्वर कहा जाता है। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है। यह निराकार मुख है।
यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है।
{४}-  यह शिवलिंग बहुत ही कीमती और चमत्कारी है। माना जाता है कि यह शिवलिंग पारस के पत्थर से बना है।
पारस का पत्थर ऐसा होता है कि लोह को भी सोना बना देता है।
{५}- पशुपति मंदिर में चारों दिशाओं में एक मुख और एक मुख ऊपर की और है।
हर मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल मौजूद है।
{६}- इस मंदिर में बाबा का प्रकट होने के पीछे भी पौराणिक कथा है।
इसके अनुसार जब महाभारत के युद्ध में पांडवों द्वारा अपने ही रिश्तेदारों का रक्त बहाया गया तब भगवान शिव उनसे बेहद क्रोधित हो गए थे।
श्री कृष्ण के कहने पर वे भगवान शिव से मांफी मांगने के लिए निकल पड़े।
गुप्त काशी में पांडवों को देख कर भगवान शिव वहां से विलुप्त होकर एक अन्य स्थान पर चले गए। आज इस स्थान को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है।
{७}- शिव का पीछा करते हुए पांडव केदारनाथ भी पहुंच गए लेकिन भगवान शिव उनके आने से पहले ही भैंस का रूप लेकर वहां खड़े भैंसों के झुंड में शामिल हो गए। पांडवों ने महादेव को पहचान तो लिया लेकिन भगवान शिव भैंस के ही रूप में भूमि में समाने लगे।
इस पर भीम ने अपनी ताकत के बल पर भैंस रूपी महादेव को गर्दन से पकड़कर धरती में समाने से रोक दिया।
भगवान शिव को अपने असल रूप में आना पड़ा और फिर उन्होंने पांडवों को क्षमादान दे दिया।
लेकिन भगवान शिव का मुख तो बाहर था लेकिन उनका देह केदारनाथ पहुंच गया था।
जहां उनका देह पहुंचा वह स्थान केदारनाथ और उनके मुख वाले स्थान पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
{८}-  इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि अगर आपने पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन किए तो पूरा पुण्य पाने के लिए आपको केदार मंदिर में भी भोले नाथ के दर्शन करने जाना पडेगा।
क्योंकि पशुपतिनाथ में भैंस के सिर और केदारनाथ में भैंस की पीठ के रूप में शिवलिंग की पूजा होती है।
{९}- पशुपति मंदिर को लेकर मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति यहां पर दर्शन के लिए आता है तो उसे किसी जन्म में पशु की योनि नहीं मिलती है।
{१०}- इस मंदिर को लेकर एक दूसरी मान्यता यह भी है कि अगर आपने पशुपति के दर्शन किएं तो आप नंदी के दर्शन न करें।
नहीं तो आपको दूसरे जन्म में पशु का जन्म मिलेगा। केदारनाथ जी के दर्शन करने के बाद अगर आपको नंदी दर्शन होता है, तो दोष नही लगता।
{११}- इस मंदिर के बाहर एक घाट बना हुआ है जिसे आर्य घाट के नाम से जाना जाता है।
इस घाट के बारें में कहा जाता है कि सिर्फ इस घाटका ही पानी मंदिर के अंदर जाता है।
और किसी जगह के पानी को ले जाना वर्जित है।
                 ॥ हर हर महादेव ॥
           ।। पशुपतिनाथ की जय हो ।।
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