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10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59D || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन (751 से 1000 तक)

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59D || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन  भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन                  (751 से 1000 तक) ७५१. सदा वेदवाक्यैः स्तुतः सदा वेदवचनोंद्वारा स्तुत,  ७५२. शेषशायी- शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले ॥ ९७ ॥ ७५३. अमरेषु ब्राह्मणैः परीक्षावृतः भृगु आदि ब्राह्मणोंने परीक्षा करके सब देवताओंमें श्रेष्ठरूपसे जिनका वरण किया है,  ७५४. भृगुप्रार्थितः भृगुसे प्रार्थित,  ७५५. दैत्यहा - दैत्यनाशक,  ७५६. ईशरक्षी भस्मासुरको भस्म करके शिवजीकी रक्षा करनेवाले,  ७५७. अर्जुनस्य सखा- अर्जुनके मित्र,  ७५८. अर्जुनस्यापि मानप्रहारी- अर्जुनका भी अभिमान भङ्ग करनेवाले,  ७५९. विप्रपुत्रप्रदः - ब्राह्मणको पुत्र प्रदान करनेवाले,  ७६०. धामगन्ता=ब्राह्मणके पुत्रोंको लानेके लिये अपने दिव्यधाममें जानेवाले ॥ ९८ ॥ ७६१. माधवीभिर्विहारस्थितः अपनी भार्या स्वरूपा मधुकुलकी स्त्रियोंके साथ समुद्रमें जल-विहार करनेवाले,  ७६२. कलाङ्गः- कलाएँ जिनक...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59C || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन (501 से 750 तक)

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59C || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन  भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन                  (501 से 750 तक) ५०१. बाणपुत्रीपतिः- बाणासुरकी कन्या ऊषाके स्वामी,  ५०२. महासुन्दर:- अतिशय सौन्दर्य शाली,  ५०३. कामपुत्रः प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धरूप,  ५०४. बलीश:- बलवानोंके ईश्वर ॥ ६९ ॥ ५०५. महादैत्यसंग्रामकृद् यादवेशः- बड़े-बड़े दैत्योंके साथ युद्ध करनेवाले यादवोंके स्वामी,  ५०६. पुरीभञ्जनः = बाणासुरकी नगरीको नष्ट-भ्रष्ट करनेवाले  ५०७. भूतसंत्रासकारी भूतगणोंको संत्रस्त कर देनेवाले,  ५०८. मृधे रुद्रजित् युद्धमें रुद्रको जीतनेवाले,  ५०९. रुद्रमोही- जृम्भणास्त्रके प्रयोगसे रुद्रदेवको मोहित करनेवाले,  ५१०. मृधार्थी = युद्धाभिलाषी,  ५११. स्कन्दजित् कुमार कीर्तिकेयको परास्त करनेवाले  ५१२. कूपकर्णप्रहारी 'कूपकर्ण' नामक प्रमथगणपर प्रहार करनेवाले ॥ ७० ॥ ५१३. धनुर्भञ्जनः धनुष भङ्ग करनेवाले,  ५१४. बाणमानप्रहारी बाणास...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59B || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन (251 से 500 तक)

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59B || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन  भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन                  (251 से 500 तक) २५१. सुकेशो व्रजेश: सुन्दर केशवाले व्रजमण्डलके स्वामी,  २५२. सखा सख्य-रतिके आलम्बन,  २५३. वल्लभेशः प्राणवल्लभा श्रीराधाके हृदयेश,  २५४. सुदेश :- सर्वोत्कृष्ट देशस्वरूप ॥ ४२ ॥ २५५. कणत्किङ्किणीजालभृत् → झनकारती किङ्किणीकी लड़ों को धारण करनेवाले, २५६. नूपुराढ्यः = चरणोंमें नूपुरोंकी शोभासे सम्पन्न,  २५७. लसत्कङ्कणः - कलाइयोंमें सुन्दर कंगन धारण करनेवाले,  २५८. अङ्गदी- बाजूबंदधारी,   २५९. हारभार:- हारोंके भारसे विभूषित,  २६०. किरीटी=मुकुटधारी, २६१. चलत्कुण्डलः कानोंमें हिलते हुए कुण्डलोंसे सुशोभित,  २६२. अङ्गुलीयस्फुरत्कौस्तुभः-हाथोंमें अंगूठीके साथ वक्षःस्थलपर जगमगाती हुई कौस्तुभमणि धारण करनेवाले,  २६३. मालतीमण्डिताङ्गः = मालतीकी मालासे अलंकृत शरीरवाले ॥ ४३ ॥ २६४. महानृत्यकृत्-महारास नृत्य करनेवाले,...

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 04 || शाण्‍डिल्‍य मुनि का राजा प्रतिबाहु को गर्गसंहिता सुनाना; श्रीकृष्‍ण प्रकट होकर राजाको वरदान देना; राजाको पुत्र की प्राप्‍ति और संहिता का माहात्‍म्‍य

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 04 || शाण्‍डिल्‍य मुनि का राजा प्रतिबाहु को गर्गसंहिता सुनाना; श्रीकृष्‍ण प्रकट होकर राजाको वरदान देना; राजाको पुत्र की प्राप्‍ति और संहिता का माहात्‍म्‍य महादेवजी बोले - प्रिये ! मुनीश्‍वर शाण्‍डिल्‍य का यह कथन सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्‍नता हुई। उसेन विनयावत होकर प्रार्थना की- ‘मुने ! मैं आपके शरणागत हूँ। आप शीघ्र ही मुझे श्रीहरि की कथा सुनाइये और पुत्रवान् बनाइये’।  राजा की प्रार्थना सुनकर मुनिवर शाण्‍डिल्‍य ने श्रीयमुनाजी के तट पर मण्‍डप का निर्माण करके सुखदायक कथा-परायण आयोजन किया। उसे सुनकर सभी मथुरावासी वहाँ आये ।महान ऐश्‍वर्यशाली यादवेन्‍द्र श्रीप्रतिबाहु कथारम्‍भ तथा कथा समाप्‍ति के दिन ब्राह्मणों को उत्‍तम भोजन कराया तथा बहुत-सा धन दान दिया। तत्‍पश्‍चात राजा ने मुनिवर शाण्‍डिल्‍य का भली-भाँति पूजन करके उन्‍हें रथ, अश्व, द्रव्‍यराशि, गौ, हाथी और ढेर-के-ढेर रत्‍न दक्षिणा में दिये। सर्वमंगले ! तब शाण्‍डिल्‍य ने मेरे द्वारा कहे हुए श्रीमान् गोपालकृष्‍ण के सहस्‍त्रनामका पाठ किया, जो सम्‍पूर्ण दोषों को हर लेने वाला है। कथा समाप्‍त होने पर शा...

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 03 || राजा प्रतिबाहु के प्रति महर्षि शाण्‍डिल्‍य द्वारा गर्गसंहिता के माहात्‍म्‍य और श्रवण-विधि का वर्णन

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 03 || राजा प्रतिबाहु के प्रति महर्षि शाण्‍डिल्‍य द्वारा गर्गसंहिता के माहात्‍म्‍य और श्रवण-विधि का वर्णन शाण्‍डिल्‍य ने कहा- राजन् ! पहले भी तो तुम बहुत-से उपाय कर चुके हो, परंतु उनके परिणामस्‍वरूप एक भी कुलदीपक पुत्र उत्‍पन्न नहीं हुआ। इसलिये अब तुम पत्नी के साथ शुद्ध-हृदय होकर विधिपूर्वक ‘गर्गसंहिता’ का श्रवण करो। राजन् ! यह संहिता धन, पुत्र और मुक्‍ति प्रदान करने वाली है। यद्यपि यह एक छोटा सा उपाय है, तथापि कलियुग में जो मनुष्‍य इस संहिता का श्रवण करते हैं, उन्‍हें भगवान विष्‍णु पुत्र, सुख आदि सब प्रकार की सुख-सम्‍पत्‍ति दे देते हैं। नरेश ! गर्गमुनि की इस संहिता के नवाह पारायणरूप यज्ञ से मनुष्‍य सद्य:पावन हो जाते हैं। उन्‍हें इस लोक में परम सुख की प्राप्‍ति होती है तथा मृत्‍यु के पश्‍चात् वे गोलोकपुरी में चले जाते हैं। इस कथा को सुनने से रोगग्रस्‍त मनुष्‍य रोग-समूहों से, भयभीत भय से और बन्‍धनग्रस्‍त बन्‍धन से मुक्‍त हो जाता है। निर्धन को धन-धान्‍य की प्राप्‍ति हो जाती है तथा मूर्ख शीघ्र ही पण्‍डित हो जाता है। इस कथा के श्रवण से ब्राह्मण विद्वान,...

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 02 || नारद जी की प्रेरणा से गर्ग द्वारा संहिता की रचना; संतान के लिए दुखी राजा व्यक्ति बहू के पास महर्षि शांडिल्य का आगमन

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 02 || नारद जी की प्रेरणा से गर्ग द्वारा संहिता की रचना; संतान के लिए दुखी राजा व्यक्ति बहू के पास महर्षि शांडिल्य का आगमन महादेवजी ने कहा- देवर्षि नारद का कथन सुनकर महामुनि गर्गाचार्य विनय से झुककर हंसते हुए यों कहने लगे । गर्गजी बोले- ब्रह्मन ! आपकी कही हुई बात यद्यपि सब तरह से अत्‍यन्‍त कठिन है- यह स्‍पष्‍ट है, तथापि यदि आप कृपा करेगें तो मैं उसका पालन करूंगा।  सर्वमंगले ! यों कहे जाने पर भगवान नारद हर्षातिरेक से अपनी वीणा बजाते और गाते हुए ब्रह्मलोक में चले गये। तदनन्‍तर गर्गाचल पर जाकर कवि श्रेष्‍ठ गर्ग ने इस महान अद्भुत शास्‍त्र की रचना की। इसमें देवर्षि नारद और राजा बहुलाश्‍व के संवाद का निरूपण हुआ है। यह श्रीकृष्‍ण के विभिन्‍न विचित्र चरित्रों से परिपूर्ण तथा सुधा-सदृश स्‍वादिष्‍ट बारह हजार श्‍लोकों से सुशोभित है। गर्गजी ने श्रीकृष्‍ण के जिस महान चरित्र को गुरु के मुख से सुना था, अथवा स्‍वयं अपनी आंखों देखा था, वह सारा-का-सारा चरित्र इस संहिता में सजा दिया है। वह कथा ‘श्रीगर्गसंहिता’ नाम से प्रचलित हुई। यह कृष्‍णभक्‍ति प्रदान करने वाली ...

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 01 || गर्ग संहिता के प्राकट्य का उपक्रम

11. गर्ग संहिता-माहात्‍म्‍य || अध्याय 01 || गर्ग संहिता के प्राकट्य का उपक्रम  जो श्रीकृष्‍ण को ही देवता (आराध्‍य) मानने वाले वृष्‍णिवंशियों के आचार्य तथा कवियों में सर्वश्रेष्‍ठ हैं, उन महात्‍मा श्रीमान गर्गजी को नित्‍य बारंबार नमस्‍कार है।  शौनक जी बोले- ब्रह्मन् ! मैंने मुख से पुराणों का उत्‍तम-से-उत्‍तम माहात्‍म्‍य विस्‍तारपूर्वक सुना है, वह श्रोत्रेन्‍दिय के सुख की वृद्धि करने वाला है। अब गर्ग मुनि की संहिता का जो सार रूप माहात्‍म्‍य है, उसका प्रयत्‍नपूर्वक विचार करके मुझसे वर्णन कीजिये। अहो! जिसमें श्रीराधा-माधव की महिमा का विविध प्रकार से वर्णन किया गया है, वह गर्ग मुनि की भगवल्‍लीला-सम्‍बन्‍धिनी संहिता धन्‍य है। सूतजी कहते हैं- अहो शौनक ! इस माहात्‍म्‍य को मैंने नारद जी से सुना है। इसे सम्‍मोहन-तन्‍त्र में शिवजी ने पार्वती से वर्णन किया था। कैलास पर्वत के निर्मल शिखर पर, जहाँ अलकनन्‍दा के तट पर अक्षय वट विद्यमान है,उसकी छाया में शंकरजी नित्‍य विराजते हैं। एक समय की बात है, सम्‍पूर्ण मंगलों की अधिष्‍ठात्री देवी गिरिजा ने प्रसन्‍नतापूर्वक भगवान शंकर से अपनी मनभावी बात पू...